भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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अन्ततक सुना दो । मित्रने पुलिसके भयसे मुझे एक गुप्त स्थानमें छिपा दिया और जब तक मुझे पूरी तरहसे आराम न हो गया, मेरी खूब ही सेवा-शुश्रूषा की ।

इस घटनासे मेरा दिल ऐसा खट्टा हुआ, कि मैंने अपनी सारी दौलत उसी कुलटके पास छोड़कर जड़लकी राह ली । मुझे अब संसार अत्यन्त दुःख मालूम होता है । जब-कभी मेरे मनमें वेदना होती है, वह श्लोक मेरे मुँहसे निकल जाता है । अब तो मैं सभीको उपदेश देता रहता हूँ कि भाइयो ! स्त्री-जातिसे सावधान रहो । इस काली नागिनका विश्वास मत करो । जो इसके फन्देमें फँसकर ईश्वरको भूलता है, अपना मनुष्य-जन्म बुरा गँवाता है । स्वामी शंकराचार्यने बहुत ठीक कहा है—

का ते कान्ता कस्ते पुत्रः ।

संसारोऽयमतीव विचित्रः ॥

कस्य त्वं कः कुतः आयातः ।

तत्त्वं चिन्तय यदिदं भ्रातः ॥

भजगोविन्दं भजगोविन्दं गोविन्दं भज मृदु मते ॥

कौन तेरी स्त्री है ? कौन तेरा पुत्र है ? यह संसार अतीव विचित्र है । हे भाई ! इस असल बातको विचार कर कि, तू कहाँसे आया है ? कौन तेरा है ? अरे मृदु ! सबको तज और गोविन्द को भज ।