भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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इस समय यहाँसे निकल भागनेमें ही जीवनकी ख़ैर है। यह हत्यारी मुझे मारे बिना न छोड़ेगी। अगर और तरह न मार सकेंगी, तो विष खिलाकर या किसी और तरह मार डालेगी। जीवन रहेगा, तो अपनी मोक्ष या अपने उद्धारका उपाय तो कर सकूँगा। ऐसा विचार करके, मैं वहाँसे फौल ही नौ दो ग्यारह हुआ। गलियोंमें छिपता हुआ, अपने उसी उपदेशक मित्रके पास पहुँचा। मित्रने मेरी हालत देखकर पूछा—“कहो, क़ौर तो है ? यह क्या हाल है ? पीठमेंसे खून क्यों बह रहा है ?” मैंने पहले महाकवि अकबरका यह शेर कह सुनाया—

जिसकी उल्फ़त का बड़ा दावा था अकबर ! कल तुम्हें । आज हम जाकर उसे देख आये, हरजार्द तो हैं ॥

भार्द, जिसकी मुहब्बतका हमें कल बड़ा घमण्ड था, आज उसे हमने देख लिया ; वह तो कुछ नहीं, निरी हरजार्द है। मित्र ! तुमने सच कहा था ; पर समय आये बिना काम नहीं होता। बिस्वर्मगलको महात्मा नारदने बहुत समझाया, पर उन्होंने वैश्याका संग न छोड़ा। लेकिन समय आने पर फौलन ज्ञानोदय हुआ और उन्होंने उसे त्याग दिया। मैंने आपकी बातें मानकर, कल रातको स्त्रीकी परीक्षा की। वह तो अब्बल दर्जकी कुलटा निकली। वह अपनी गलीमें पहरा देनेवाले नौच चौकोदारसे फँसी थी। इसके बाद मैंने सारी कहानी आदिसे