भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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घोड़े प्रभृति निकल रहे थे। खेळते-खेळते उस मुगशावकनयनी की दृष्टि एक सुन्दर, रूपवान, बलवान, यौवनमदीन्यत गठीले जवान पर पड़ी। क्षण-भरमें उसकी मति बदल गई। वह पति-व्रत धर्मका माहात्म्य भूल कर, व्यभिचार-कर्म करने पर आमादा हो गई। प्रबल कामदेवके वशमें होकर, उसे इस नीच कर्मके परिणामका कुछ भी ध्यान न हुआ। उसने अपने वैभवशाली पिता की इज्जत धूलमें मिलनेका भी विचार न किया। कहा है—

कुलपतनं जनगर्हो, वन्यतमपि जीवितव्यसन्देहम् ।

अंगीकरोति कुलठा, सततं परपुरुषसंस्का ॥

कुलमें दाग लगाना, लोकनिन्दा, बन्धन और जीवनमें सन्देह—इन सबको परपुरुषरता कुलठा खोकार कर लेती है।

बहुत लिखनेसे क्या—वह चञ्चलनयनी अपने कामविकारको न रोक सकी। उसका शरीर कामतापसे जलने लगा, होठ सूखने लगे, दिल धड़कने लगा और कामञ्चर चढ़ आया। उसने कामशास्त्रिके लिए, उस नौजवानको अपने पास बुलानेका विचार स्थिर कर लिया। उसकी अन्तरात्मा—कॉन्शेन्स (conscience) ने उससे कहा—“अधि चपले! आज तू अपने जीवनको भ्रष्ट करने पर क्यों उतारू हुई है? अपना शीलव्रत क्यों भङ्ग करती है? देव, नदी अपनी कठार रूपी मर्यादाका नाश नहीं करती, उसी तरह तुझे भी अपने कुलकी मर्यादा