भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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केशस्यांगमदत्वां सुखमेव मुखानिनेहलभ्यन्ते ।

मधुभिन्मथनायस्तैराशिलभ्यति वाहुर्भिराक्ष्मीम् ॥

दुरधिगमः परभागो यावत् पुरुषेण साहसं न कृतम् ।

जयतितुलामधिरुद्धे भास्वानिह जलदपटलानि ॥

“इस संसारमें, शरीरको दुःख दिये बिना सुख नहीं मिलता। मधुसूदन भगवान् ने समुद्र मथनेसे थकी हुई भुजाओं द्वारा ही लक्ष्मी पाई।

“जब तक पुरुष साहस न करे, तब तक उसे पराया भाग मिलना कठिन है। तुला राशिको प्राप्त होकर ही सूर्य बादलोंको जीतता है।”

गुणनिधिकी बातें सुनकर रत्नसेन राजी हो गया। दस-बीस लाखका माल देकर उसे विदा कर दिया। कन्दर्पकला पतिके विदेश जानसे दुखी ज़रूर हुई, पर उसने भी रो-घो कर अपनी ओरसे विदाई देदी। सब व्योपारियोंके साथ गुणनिधि विदेश-यात्राको चल दिया।

अपने प्रिय पतिके विदेश चले जाने पर, कन्दर्पकला अपनी स्त्रियोंके साथ चौसर-शतरञ्ज प्रभृति खेल खेल कर दिन काटने लगी। कन्दर्पकला इन दिनों काम-मदसे मतवाठी हो रही थी। एक दिन, सन्ध्याके समय, वह अपनी सखियोंके साथ, महलकी छत पर बैठकर, शतरञ्ज खेल रही थी। महल ठीक ल्बे सड़क था। उसके सामने होकर हज़ारों आदमी और गाड़ी-