भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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माता-पिता भी अपनी पुत्री और जामाताको प्रेमपूर्वक रहते हुए देखकर फूले नहीं समाते थे।

कुछ समय बीतने पर, रत्नसेनकी आदतमें सुमात्रा, जावा, बोर्युं, चीन, लंका, फ़ारस और रुम देशके व्योपारी तरह-तरहके मसाले, रेशम, रेशमी कपड़े, मोती और शोशा प्रभृति नाना प्रकारका माल लाये। उन व्योपारियोंको मालकी बिक्रीसे प्रचुर धन-लाभ हुआ। अब वे लोग अमरावतीसे यहाँका माल खरीद कर, फिर उन देशोंको जानेकी तैयारी करने लगे। उन लोगोंको खूब धन कमाते देखकर, गुणनिधिका दिल भी यहाँसे माल भर कर उन देशोंमें जानेको हुआ। उसने सास-ससुरसे आज्ञा माँगी। सास-ससुरने इकार किया। कहा—“वेदा ! अपने धनकी कमी नहीं ; अटूट धन-भाण्डार है। तुम्हीं भोगने वाले हो, विदेश जाकर क्या करोगे ?” गुणनिधिने कहा—पिता जी ! वैश्यका धर्म ही धन-वृद्धि करना है। अक्षय धनराशि होने पर भी, वैश्यको सन्तोष न करना चाहिये। देखिये, शास्त्रमें लिखा है—

कोऽतिभारः समर्थानां, किं दूरं व्यवसायिनाम् ।

को विदेशः सुविद्यानां, कः परः प्रियवादिनाम् ॥

“सामर्थ्यवानोंके लिए बहुत भारी क्या है ? व्यापारियोंके लिए दूर क्या है ? विद्वानोंको परदेश क्या है। मनुस्माथियोंको गैर या पराया कौन है ?

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