भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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निर्वित्तः ऋणयोऽतिचंचलमतिर्नित्यप्रवासी शृणी ।

भिन्नः स्नेहविवर्जितः सुमतिभिः कार्यावरोनेदृशः ॥

“बूढ़े, बुरे-बुरे व्यसनोंमें फँसे हुए, निर्दयी, रोगी, घोर-पापी, नामर्द, नीच कुलमें पैदा हुए, ख़ुगलख़ोर, धूर्त्त, इच्छा-ओंकों बहुत ही रोकने वाले, निर्धन, कंजूस, बहुत ही चञ्चल-बुद्धि, हमेशा परदेशमें रहनेवाले, कज़्दार, भिखारी और स्नेह-हीन पुरुषको जमाई न बनाना चाहिये ।

“कन्दर्पकी मा ! अपने गुणनिधिमें सभी उत्तम गुण हैं, दूष-षोंका नाम भी नहीं । सच पूछो तो जमाई यथा नाम तथा गुण है, इसलिये गुणनिधिको ही कन्या देना ठीक है ।”

शुभ लक्ष्यमें विवाहकी तैयारी शुरू को गई । दोनों ओरसे विराट् आयोजन हुआ । नियत समय पर गुणनिधिकी बारात आई । शुभ मुहुर्त्तमें गुणनिधिने कन्दर्पकलाका पाणिग्रहण किया । कन्याके पिताने अपनी इकलौती बेटीके दहेजमें करोड़ोंकी सम्पत्ति, हाथी, घोड़े, दास-दासी, रथ और पालकी वगैरः दिये । बाराती और गुणनिधिके पिता अपने नगरको चले गये । दहेजका सामान उनके साथ भेज दिया गया, पर गुणनिधिको कन्दर्पकलाके पिताने अपने घर ही रख लिया । गुणनिधिका बाप सज्जन पुरुष था । उसने अपने समर्थकी बात, यिना किसी विशेष आपत्तिके, मान ली । गुणनिधि सुसरालमें घर-जमाईकी तरह रहकर, स्वर्गीय सुख भोगने लगा । कन्दर्पकला भी उससे सब तरहसे प्रसन्न और सन्तुष्ट थी ।

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