शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
( ३३६ )
निर्वित्तः ऋणयोऽतिचंचलमतिर्नित्यप्रवासी शृणी ।
भिन्नः स्नेहविवर्जितः सुमतिभिः कार्यावरोनेदृशः ॥
“बूढ़े, बुरे-बुरे व्यसनोंमें फँसे हुए, निर्दयी, रोगी, घोर-पापी, नामर्द, नीच कुलमें पैदा हुए, ख़ुगलख़ोर, धूर्त्त, इच्छा-ओंकों बहुत ही रोकने वाले, निर्धन, कंजूस, बहुत ही चञ्चल-बुद्धि, हमेशा परदेशमें रहनेवाले, कज़्दार, भिखारी और स्नेह-हीन पुरुषको जमाई न बनाना चाहिये ।
“कन्दर्पकी मा ! अपने गुणनिधिमें सभी उत्तम गुण हैं, दूष-षोंका नाम भी नहीं । सच पूछो तो जमाई यथा नाम तथा गुण है, इसलिये गुणनिधिको ही कन्या देना ठीक है ।”
शुभ लक्ष्यमें विवाहकी तैयारी शुरू को गई । दोनों ओरसे विराट् आयोजन हुआ । नियत समय पर गुणनिधिकी बारात आई । शुभ मुहुर्त्तमें गुणनिधिने कन्दर्पकलाका पाणिग्रहण किया । कन्याके पिताने अपनी इकलौती बेटीके दहेजमें करोड़ोंकी सम्पत्ति, हाथी, घोड़े, दास-दासी, रथ और पालकी वगैरः दिये । बाराती और गुणनिधिके पिता अपने नगरको चले गये । दहेजका सामान उनके साथ भेज दिया गया, पर गुणनिधिको कन्दर्पकलाके पिताने अपने घर ही रख लिया । गुणनिधिका बाप सज्जन पुरुष था । उसने अपने समर्थकी बात, यिना किसी विशेष आपत्तिके, मान ली । गुणनिधि सुसरालमें घर-जमाईकी तरह रहकर, स्वर्गीय सुख भोगने लगा । कन्दर्पकला भी उससे सब तरहसे प्रसन्न और सन्तुष्ट थी ।
( ३३७ )
माता-पिता भी अपनी पुत्री और जामाताको प्रेमपूर्वक रहते हुए देखकर फूले नहीं समाते थे।
कुछ समय बीतने पर, रत्नसेनकी आदतमें सुमात्रा, जावा, बोर्युं, चीन, लंका, फ़ारस और रुम देशके व्योपारी तरह-तरहके मसाले, रेशम, रेशमी कपड़े, मोती और शोशा प्रभृति नाना प्रकारका माल लाये। उन व्योपारियोंको मालकी बिक्रीसे प्रचुर धन-लाभ हुआ। अब वे लोग अमरावतीसे यहाँका माल खरीद कर, फिर उन देशोंको जानेकी तैयारी करने लगे। उन लोगोंको खूब धन कमाते देखकर, गुणनिधिका दिल भी यहाँसे माल भर कर उन देशोंमें जानेको हुआ। उसने सास-ससुरसे आज्ञा माँगी। सास-ससुरने इकार किया। कहा—“वेदा ! अपने धनकी कमी नहीं ; अटूट धन-भाण्डार है। तुम्हीं भोगने वाले हो, विदेश जाकर क्या करोगे ?” गुणनिधिने कहा—पिता जी ! वैश्यका धर्म ही धन-वृद्धि करना है। अक्षय धनराशि होने पर भी, वैश्यको सन्तोष न करना चाहिये। देखिये, शास्त्रमें लिखा है—
कोऽतिभारः समर्थानां, किं दूरं व्यवसायिनाम् ।
को विदेशः सुविद्यानां, कः परः प्रियवादिनाम् ॥
“सामर्थ्यवानोंके लिए बहुत भारी क्या है ? व्यापारियोंके लिए दूर क्या है ? विद्वानोंको परदेश क्या है। मनुस्माथियोंको गैर या पराया कौन है ?
२२
( ३३८ )
केशस्यांगमदत्वां सुखमेव मुखानिनेहलभ्यन्ते ।
मधुभिन्मथनायस्तैराशिलभ्यति वाहुर्भिराक्ष्मीम् ॥
दुरधिगमः परभागो यावत् पुरुषेण साहसं न कृतम् ।
जयतितुलामधिरुद्धे भास्वानिह जलदपटलानि ॥
“इस संसारमें, शरीरको दुःख दिये बिना सुख नहीं मिलता। मधुसूदन भगवान् ने समुद्र मथनेसे थकी हुई भुजाओं द्वारा ही लक्ष्मी पाई।
“जब तक पुरुष साहस न करे, तब तक उसे पराया भाग मिलना कठिन है। तुला राशिको प्राप्त होकर ही सूर्य बादलोंको जीतता है।”
गुणनिधिकी बातें सुनकर रत्नसेन राजी हो गया। दस-बीस लाखका माल देकर उसे विदा कर दिया। कन्दर्पकला पतिके विदेश जानसे दुखी ज़रूर हुई, पर उसने भी रो-घो कर अपनी ओरसे विदाई देदी। सब व्योपारियोंके साथ गुणनिधि विदेश-यात्राको चल दिया।
अपने प्रिय पतिके विदेश चले जाने पर, कन्दर्पकला अपनी स्त्रियोंके साथ चौसर-शतरञ्ज प्रभृति खेल खेल कर दिन काटने लगी। कन्दर्पकला इन दिनों काम-मदसे मतवाठी हो रही थी। एक दिन, सन्ध्याके समय, वह अपनी सखियोंके साथ, महलकी छत पर बैठकर, शतरञ्ज खेल रही थी। महल ठीक ल्बे सड़क था। उसके सामने होकर हज़ारों आदमी और गाड़ी-
( ३३६ )
घोड़े प्रभृति निकल रहे थे। खेळते-खेळते उस मुगशावकनयनी की दृष्टि एक सुन्दर, रूपवान, बलवान, यौवनमदीन्यत गठीले जवान पर पड़ी। क्षण-भरमें उसकी मति बदल गई। वह पति-व्रत धर्मका माहात्म्य भूल कर, व्यभिचार-कर्म करने पर आमादा हो गई। प्रबल कामदेवके वशमें होकर, उसे इस नीच कर्मके परिणामका कुछ भी ध्यान न हुआ। उसने अपने वैभवशाली पिता की इज्जत धूलमें मिलनेका भी विचार न किया। कहा है—
कुलपतनं जनगर्हो, वन्यतमपि जीवितव्यसन्देहम् ।
अंगीकरोति कुलठा, सततं परपुरुषसंस्का ॥
कुलमें दाग लगाना, लोकनिन्दा, बन्धन और जीवनमें सन्देह—इन सबको परपुरुषरता कुलठा खोकार कर लेती है।
बहुत लिखनेसे क्या—वह चञ्चलनयनी अपने कामविकारको न रोक सकी। उसका शरीर कामतापसे जलने लगा, होठ सूखने लगे, दिल धड़कने लगा और कामञ्चर चढ़ आया। उसने कामशास्त्रिके लिए, उस नौजवानको अपने पास बुलानेका विचार स्थिर कर लिया। उसकी अन्तरात्मा—कॉन्शेन्स (conscience) ने उससे कहा—“अधि चपले! आज तू अपने जीवनको भ्रष्ट करने पर क्यों उतारू हुई है? अपना शीलव्रत क्यों भङ्ग करती है? देव, नदी अपनी कठार रूपी मर्यादाका नाश नहीं करती, उसी तरह तुझे भी अपने कुलकी मर्यादा
( ३४० )
नाश न करनी चाहिये । सतीत्वरत्न अनमोल है । स्त्रीमें यही सबसे क्रीमती चीज है । इसके बिना स्त्री वैसी ही है, जैसा कि बिना आबका मोती । इस क्षणभरके मिथ्या सुखके लिए, क्यों अपने लोक-परलोक बिगाड़ती है ?” अन्तरात्माने उसे बहुत-कुछ समझाया, डराया-धमकाया, पर वह अपने निश्चयसे न डिगी—अन्तरात्माकी बातपर जरा भी ध्यान न दिया । ध्यान तो तब देती, जबकि वह होश-हवासमें होती । कामदेवने तो पुष्पवाण मार-मारकर उसे बेहोश कर दिया था ।
कन्दर्पकला कन्दर्पके वाणोंसे जर्जरित होकर मन-हो-मन विचारने लगी—“इस समय कौन मेरे काम आ सकती है ? कौन प्राणप्यारैको बुलाकर यहाँ ला सकती है ? कामशास्त्रमें मालिन, धोवन, नाइन, सखी और दासी प्रभृति स्त्रियाँ स्त्रीपुरुषोंका सन्देशा लाने-ले जाने या दूती-कर्म॑के लिए उत्तम लिखी हैं, तब
ॐ दासी वारवधर्णटी च विधवा बाला च धात्री तथा । कन्या प्रवजिता च भिन्नवनिता सम्बन्धिनी यत्निपनी ॥ मालाकार नितम्बिनी प्रतिसखी दौत्ये स्मृता योषितः । बालाप्यः कविभिः सदैव मदनव्यापार लीलाविधौ ॥
और भी—
मालाकारवधुः सखी च विधवा धात्री मटीशिल्पनी । हैरन्ध्री प्रतिगोहिकाय रजकी दासी च सम्बन्धिनी ॥ बाला प्रवजिता च भिन्नवनिता तत्कस्य विक्रयिका । मालाकार वधूर्विदरधपुरुषैः प्रेप्या इमा दूतिकाः ॥
This is a high-contrast, black-and-white photograph. The left side of the frame is dominated by a large, bright white rectangular area, which appears to be a page or a screen. The right side is dark and textured. A vertical strip of dark, frayed material, possibly a curtain or a piece of fabric, runs along the top and right edges. A diagonal white line or strip is visible in the lower right quadrant, cutting across the dark background. The overall composition is stark and minimalist.
भुङ्गारशतक
उँगलीसे उस नौजवानको दिखाते हुए कहा—“यारी सखी ! तू उस छैल-छबोल-रसील युवकको मेरे पास बुलाला ।” पृष्ठ ३४१
Popular Press—Calcutta.
( ३४१ )
मैं अपनी सखियोंमेंसे : किसी एकसे यह काम क्यों न लूँ ?” यह विचार खिर करके, उसने अपनी एक बहुत ही सुँह-लगी सखीको पास बुलाकर, उँगलीसे उस नौजवानको दिखाते हुए कहा— “प्यारी सखी ! तू उस छैल-छबीले-रसीले युवकको मेरे पास बुला ला । मेरी कामाग्नि इस समय बड़े जोरोंसे प्रज्वलित हो रही है । अगर वह बाँका छेला न आयेगा, तो मैं प्रचण्ड विरहा-नलमें भस्म हो जाऊँगी ।” कामविकार हलाहल विषकी तरह प्रचण्ड होता है । उसे कोई विरली ही कामिनी रोकनेमें समर्थ होती है । उस नीच सखीने, अपनी सखीकी पेशी भयानक पाप-पूर्ण बात सुनकर, उसे जघन्य कर्मसे रोका तो नहीं—फोरन ही नीचे उतरी और उसे बुलाकर महलमें ले आई ।
उस पुरुषने कन्दर्पकलाकी बातें सुनकर, उसकी कामशान्ति की ; पर चलते समय कहता गया, “प्यारी ! इसमें शक नहीं कि, तू अप्सराओंको भी लजानेवाली अनित्य सुन्दरी है । तेरे एक दिन भी न मिलनेसे मेरा जीवन न रहेगा ; लेकिन मैं तेरे इस महलमें आजके बाद कभी न आऊँगा । मैं नगरसे बाहर अमुक
दासी, रगड़ी, मटनी, विषवा, लड़की, दाई, कन्या, संन्यासिनी, भिक्षारिनि, सम्बन्धिनि, कारीगरनी, मालिन, सखी, पड़ोसन, नाहन, धोवन, और दहीछाछ वेचने वाली गुजरी औरःस्त्रियाँ —स्त्रियोंको बिगाड़ने और लजानेका काम करतीहैं । ये पुरुषोंका सन्देशा औरतोंके पास और औरतोंका सदाके पास पहुँचाती हैं । इनके द्वारा श्रच्छे-श्रच्छे वरों की स्त्रियाँ झराब हो जाती हैं ।
भूझारशतक
उँगलीसे उस नौजवानको दिखाते हुए कहा—“यारी सखी ! तू उस छैल-छबोल-रसील युवकको मेरे पास बुलाला ।” पृष्ठ ३४१
Popular Press—Calcutta.
( ३४१ )
मैं अपनी सखियोंमेंसे किसी एकसे यह काम क्यों न लूँ ?” यह विचार स्थिर करके, उसने अपनी एक बहुत ही मुँह-लगी सखीको पास बुलाकर, उँगलीसे उस नौजवानको दिखाते हुए कहा—“प्यारी सखी ! तू उस छेल-छबीले-रसीले युवकको मेरे पास बुला ला । मेरी कामाग्नि इस समय बड़े जोरोंसे प्रज्वलित हो रही है । अगर वह बाँका छेला न आयेगा, तो मैं प्रचण्ड विरहा-नलमें भस्म हो जाऊँगी ।” कामविकार हलाहल विषकी तरह प्रचण्ड होता है । उसे कोई विरली ही कामिनी रोकनेमें समय होती है । उस नीच सखीने, अपनी सखीकी पेशी भयानक पाप-पूर्ण बात सुनकर, उसे जघन्य कर्मसे रोकता तो नहीं—फौरन ही नीचे उतरी और उसे बुलाकर महलमें ले आई ।
उस पुरुषने कन्दर्पकलाकी बाते सुनकर, उसकी कामशान्ति की ; पर चलते समय कहता गया, “प्यारी ! इसमें शक नहीं कि, तू अप्सराओंको भी लजानेवाली अनित्य सुन्दरी है । तेरे एक दिन भी न मिलनेसे मेरा जीवन न रहेगा ; लेकिन मैं तेरे इस महलमें आजके बाद कभी न आऊँगा । मैं नगरसे वाहर अमुक
दासी, रगड़ी, मठनी, विधवा, लड़की, दाई, कन्या, संन्यासिनी, भिलारिन, सम्बन्धिन, कारीगरनी, मालिन, सखी, पड़ोसन, नाहन, प्रोवन, और दहीदाह्य बेचने वाली गुजरी दाीरःस्त्रियाँ—स्त्रियोंको बिगाड़ने और लड़नेका काम करती हैं । ये पुरुषोंका सन्देबा औरतोंके पास और औरतोंका मर्दोंके पास पहुँचाती हैं । इनके द्वारा अच्छे-बच्छे वरों की स्त्रियाँ ख़राब हो जाती हैं ।
( ३४२ )
बागमें रहता हूँ । वह स्थान भोगविलासके लिए अत्युत्तम है। ऐश-आराम के सारे ही सामान वहाँ भी मौजूद हैं। तुम्हें हर दिन, रातके समय, वहाँ आना होगा ; क्योंकि काम-शालामें, पराये घर रहकर, सुरत करनेकी मनाही लिखी है । कहा है :—
वहिन ब्राह्मणपूज्यवर्गनिकटे नद्यां च देवालये ।
दुर्गादौ च चतुष्पथे परगृहेऽरण्येश्मशानेदिवा ।
संकान्तौ शशीसंक्षयेऽयं शरदि श्रीप्ने ज्वरात्तौव्रते ।
सन्ध्यायाच्च परिश्रमेषु सुरतं कुर्यान्न विद्वान् क्वचित् ॥
विस्तीर्णोललिते सुधाववलिते चित्रादिनालंकृते
रम्ये प्रोन्नत चत्वरैऽगुरु महाभूपादिपुष्पान्विते ।
संगीतगंविराजिते स्वभवनं दीपप्रभाभासुरे ।
निःशंक सुरतं यथाभिलषितं कुर्यात्समंकांतया ॥
“अग्नि, ब्राह्मण, माँ-बाप, गुरु और बड़े भाई प्रभृति गुरुजनों के पास, नदी-किनारे, मन्दिरमें, किले वगैरः में, चौराहे पर, पराये घरमें, जंगलमें, श्मशान-भूमिमें, दिनमें, संकान्तमें, चन्द्रमाके क्षय कालमें, शरदऋतुमें, शीष्म ऋतुमें, ज्वर चढ़ा होने पर, व्रत रखने पर, सन्ध्या-समय और मिहनत करके—विद्वान् को सुरत या स्त्री-प्रसंग न करना चाहिये ।
“जो मकान मनोहर हो, लम्बा-चौड़ा हो, जिसमें सुन्दर सङ्केदी हो रही हो, तरह-तरहके चित्रादिसे सजा हो, जहाँ धूप वगैरः सुगन्धित पदार्थ खेये गये हों, फूलोंकी खुशबू आती हो, गाने
( ३४३ )
बजानेके सितार तबला आदि बाजे रक्खे हों—ऐसे अपने मनोहर और ऊँचे मकानकी छत या आँगनमें, जो दीपकोंकी रोशनीसे देदीप्यमान हो, अपने समान स्त्रीसे, निःशंक होकर, इच्छानुसार, भोग करना चाहिये।
“प्यारी ! कामशास्त्रके रचयिताओंने जो कुछ भी लिखा है, वह बड़े अनुभवके बाद लिखा है। मैं रतिशास्त्रके विरुद्ध काम नहीं करता ; इसलिये आज रातको तुम मेरे बागमें आना। मैं तुम्हारी इन्तज़ारी करूँगा।” यह कहकर वह युवक चला गया।
उस युवकको कन्दर्पकला एक क्षणको भी छोड़ना नहीं चाहती थी। पहली मुलाकातमें ही उस नौजवानने उसके दिलमें गहरी जगह कर ली। एक तो वह रूपवान, बलवान, वीर्यवान और शौकीन छेला था ही ; दूसरे उसने उसे, कामशास्त्र-विशारद होने से, भोग-बिलास द्वारा सन्तुष्ट कर दिया, इसीसे वह उस पर जी जानसे फिदा हो गई। ऐसी प्रीतिको “अभ्यासिकी प्रीति” कहते हैं।
❁ “निसर्गजा या नैसर्गिकी, विषयजा और अभ्यासिकी” इस तरह मुख्य तीन तरहकी प्रीति होती हैं। नैसर्गिकी प्रीति अभ्यास से या माला, श्रव, मिठाई और कपड़े-गहने देनेसे नहीं होती, वह पूर्णजन्मके सम्बन्धसे होती है। वह बड़ी मजबूत मुहब्बत है। वह किसीके हज़ार चेष्टा करनेसे भी नहीं छूट सकती। वैसी प्रीति छोटी उम्रके दूल्ह-दुलहनमें नहीं हो सकती—१४। १५। १६ साल की कन्या और २०। २५ सालके लड़के की शादी होनेसे ही हो सकती है।
जो प्रीति इत्र, कुलेल, फूलमाला, गुलदस्ते, चन्दन-केशर और कस्तूरीके
( ३४४ )
वह व्यभिचारी नवयुवक सदा कन्दर्पकलाको अपने क्राबूमँ रखनेकी अनेक चेष्टायें किया करता था। उसने सबसे पहले इस बातका पता लगाया कि, यह मुझ पर क्यों आसक्त हुई है ; क्योंकि इसके यहाँ धनकी कमी नहीं, धनके सिवा और भी किसी वस्तुका अभाव नहीं। यह हमारे शहरके सबसे बड़े सेठ की पुत्री है। इसका पति यहाँ नहीं है। उसे गये बहुत दिन हो गये और आजकल बसन्तका मौसम है—जान पड़ता है, इन्हीं कारणोंसे इसने मुझे अपनाया है। कहा है—
मार्गादि श्रान्तेदेहा चिरविरहवती मासमात्रप्रसूता ।
गर्भालस्या च नव्याज्वरकृततुता त्यक्तमानप्रसन्ना ॥
लेप, उत्तमोत्तम कपड़े, नाना प्रकारके गहने, लज्जित और ज्ञापकेदार मिठाइयाँ लेने-देनेसे होती है, उसे “विषयजा प्रीति” कहते हैं।
जो प्रीति शिकार खेलने जानेसे जंगलमें हो जाती है, जो मन्दिरोंमें देवदर्शनोंको जानेसे हो जाती है, जो सजघजकर एक दूसरेको रिझानेसे हो जाती है, जो मनोहर गाना सुननेसे हो जाती है और जो भ्रानन्ददायी छरतसे हो जाती है, उसे “अभ्यासिकी प्रीति” कहते हैं।
यशोव्रता और सिद्धार्थ (महान्मा बुद्ध) की प्रीति “नेसरंगी” थी। शकुन्तला और दुष्यन्तकी प्रीति शिकारेके समय हुई थी; अतः “अभ्यासिकी” थी। बहुतसे मर्द औरतोंके गाने पर और औरतें मर्दोंके गाने पर रीझकर प्रीति कर लेते हैं, वह भी “अभ्यासिकी प्रीति” कहाती है। कन्दर्पकला इस पुरुष की रूपच्छटा और छरत की कारीगरी पर रीझी थी, इसलिये हमने इसे “अभ्यासिकी” प्रीति कहा है।
भृङ्गारशतक
उस नीचे सखीने अपनी सखीकी ऐसी भयानक पापपूर्ण बात सुनकर उसे जघन्य कर्मसे रोक़ा तो नहीं ; फौरन ही नीचे उतरी और उसे बुलाकर महलमें ले आई । उस पुरुषने कन्दपंकलाकी बातें सुनें उसको शान्ति की ।
POPULAR PRESS—CALCUTTA.
This image shows a blank white page. A finger is visible at the bottom left corner, partially obscuring the edge of the page. There are some minor scanning artifacts or dust specks scattered across the surface.
( ३४५ )
ज्ञाता पुष्पावसाने नवरतिसमये मेवकाले वसन्ते ।
प्रायः सम्पन्नरागा शृंगशिशुनयना स्वल्पसाध्या रते स्यात् ॥
मार्गं चलनेसे थकी हुई या राह भूली हुई, बहुत दिनोंसे पति-समागम न होने वाली, महीना-भरकी बच्चा जननेवाली, पाँच-छे महीनेकी गर्भवती, आलस्यवाली, नये बुखारवाली, मान-हीना, बहुत ही खुश रहने या हँसनेवाली, मासिक धर्मके बाद नहा कर उठी हुई, पहले-पहल जवानोंकी तरङ्ग आनेवाली, वर्षा-काल और वसन्त ऋतुमें—रूपवान, धनवान और बिलासी पुत्रों के हाथ, ऊपर लिखे लक्षणों वाली स्त्रियाँ, स्वयं कोशिश करने या दूतियाँ लगानेसे बड़ी आसानोंसे आ जाती हैं। खेर, अब मैं तरह-तरहके वाजीकरण और स्तम्भन योगोंको सहायतासे इसे अपनी क्रीतदासी बनाऊँगा ।
कई बरस तक हमारा गुणनिधि विदेशसे नहीं लौटा ; इधर कन्दर्पकला अपने धर्मसे पतित हो गई, पतिव्रतासे कुलटा हो गई । उसे रात-दिन अपने यार का ही ध्यान रहता था । दिन उसे एक युगके समान बितता था । साँक होते ही वह नहा-धोकर तैयार हो जाती और रातको सारे कुटुम्बके सो जाने पर, चोरद्वारसे निकल कर, अपने प्यारके पास, बिला नागा पहुँचती थी । अगर घरका कोई आदमी भूलके भी गुणनिधि का नाम ले लेता, तो उसके दिलमें काँटासा खटकता था । वह रात-दिन यही मनाती थी, कि गुणनिधि विदेशमें ही मर जावे या कभी न आवे । शास्त्रकारोंने कहा है कि, अच्छे कुलोंकी स्त्रियाँ
( ३४६ )
भी सदा बापके घरमें रहने और पतिके अधिक समय तक विदेश में रहनेसे बगड़ जाती हैं। ऐसी कुलटा नारियोंको पतिका प्रदेशमें रहना अच्छा मालूम होता है। कहा है :—
पितृसदननिवासः संगतिः पुंश्लीभिः, प्रवसनमथ रोगो वार्द्धकं चापि पत्युः । वसतिरपरपुंभिः दुष्टशीलैरवश्यं, क्षतिरपि निजवृत्तेर्योषितां नाशहेतुः ॥ दुर्दिवसे वनतिमिरे दुःसन्न्वरासु वनवीर्थसु पत्युर्विदेशगमने परमसुखं जघन चपलायाः ॥
सदा पीहरमें रहनेसे, व्याभिचारिणी स्त्रियोंकी सुहृदत्तसे, पतिके प्रदेशमें रहनेसे, पतिके सदा रोगी रहनेसे, पतिके बूढ़े होनेसे, दुष्टव्रिष्ट पेयाश-तबियत लोगोंके वशमें रहनेसे और अपनी आजीविकाके मारे जानेसे स्त्रियाँ खराब हो जाती हैं।
आकाशमें बादलोंके छाये रहनेसे, घोर अँधेरेसे, सुनसान जन्हीन गलियोंसे और पतिके विदेशमें रहनेसे परपुरुषता स्त्रियों को परम सुख होता है।
अब जरा गुणनिधिकी खबर भी लेनी चाहिये। जिस दिनसे वह अपनी स्त्री कन्दर्पकलाको छोड़कर विदेश गया, उस दिनसे उसे एक दिन भी सुखकी नींद न आई। जब कभी उसे कामसे फुर्सत मिलती, वह अपनी प्यारीको याद करता। राते तो उसे
( ३४७ )
करवटे' बदलते और तारे गिन्ते ही वीतती थीं। खैर, बरस-डेढ़-बरस चलकर, वह रोम नगरमें पहुँचा। भगवान्की दयासे उसका सारा माल गहरे मुनाफ़ेसे विक गया। अब उसे अपनी प्यारीसे मिलनेकी उत्कण्ठा औरभी बढ़ गई। एक दिन शरदुकी चाँदनी रातमें, सोते-सोते उसे अपनी प्राणप्यारीसे मिलनेकी इच्छा इस ज़ोरसे हुई, कि उसने उसी समय नौकरोंको असबाव वाँधकर जहाज़ पर रखने और तत्क्षण वहाँसे चल देनेका हुक्म दिया। हुक्म पाते ही नौकरोंने सारा सामान जहाज़ पर लाद दिया। सब लोग सवार हो गये और जहाज़ने भारतकी ओर रुख किया। कुछ दिनोंमें, समुद्र-यात्राकी तकलीफ़ें उठाता हुआ, वह अपनी सुसरालमें आ पहुँचा।
जिस दिन गुणनिधि अपनी सुसरालमें आया, उस दिन उसकी सुसरालमें कोई महोत्सव मनाया जा रहा था। कुटुम्बके सब लोग उसीमें लगे हुए थे। यह भी उनमें शामिल हो गया। उसके सास-ससुर और साली-सरहज वगैरह उसके आनेसे परमानन्दित हुए; पर कन्दर्पकलाका चेहरा उल्टा उतर गया। वह मन-ही-मन बहुत दुःखी हुई, पर प्रकटमें कुछ न कह सकी। उसके मन-मन्दिरमें तो उसका यार हँस-खेल रहा था। इसके आजानेसे उसका सारा मज़ा किरकिरा हो गया। इसका आगा उसे अच्छा न लगा।
रातके समय, बहुत दिनोंका बिछुड़ा हुआ गुणनिधि, देव-मन्दिरके समान सजे हुए महलमें, बड़ी उमंगके साथ, अपनी
( ३४८ )
प्राणप्यारीसे मिलने गया । वहाँ अति सुन्दर कमनीय धवल शय्या बिछी हुई थी । चारों ओर काफ़ी रौ बत्तियाँ जल रही थीं । सुगन्धित धूप हर ओर महक रही थी । गुलाब, झस, हिनै और मोतियेके इत्रोंकी खुशबू उड़ रही थी । चन्दनके लिङ्कावके कारण मलय मारुतका आनन्द आ रहा था । कमरेके खम्भोंमें जड़े हुए मणि-माणिक रोशनीमें जगमगा रहे थे । उस समय वह कयरा इन्द्रभवनको लजा रहा था । गुणनिधि अपनी परम-प्रियाको आलिङ्गन कर लेट रहा, पर कर्दूपकलाका दिल तो अपने प्यारे यारकी यादमें लगा हुआ था । उसे अपना व्याहता पति कालसर्पके उगले हुए विषके समान मालूम होता था । वह बारम्बार अपनी कमलसौ आँखोंको बन्द करके, योगिनकी तरह, अपने यारका ध्यान करती थी । वह हर क्षण निःश्वास फँक-फँककर, अपनी आतुरता और शोक प्रकट करती थी ; परन्तु सरलचित्त गुणनिधि इस भेदको न जानता था ; इसलिये वह चुम्बन कर, शृंगारके हाव-भाव बता, अपने सरल और सप्रेम हृदयसे मोठे-मोठे शब्दोंमें रतिकैलकी प्रार्थना करने लगा ; पर वह वज्रहृदया कुलटा कामिनी जरा भी न पसीजी । उसने पतिके प्रेमरससे पूर्ण शब्दोंका कुछ भी उत्तर न दिया ; तब कामातुर पतिने उसकी साड़ी खींच ली । वह अपने अंगोंको ढककर और सुकड़ कर एवं पर्वागसे नीचे उतर कर एक कोनेमें जा बैठी ; क्योंकि उसे तो अपने यारका ध्यान था । वह पतिके साथ भोग-विलास करना पसन्द न करती थी । भोले-भाले गुणनिधिने
A high-contrast black and white photograph showing a blank, white page, likely an endpaper or cover of a book. The page is held by a hand, with fingers visible on the right side. A dark, textured vertical strip is visible along the right edge of the page, possibly representing the book's binding or spine. The lighting is very bright on the page, creating a stark contrast with the dark background and the hand.