भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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बागमें रहता हूँ । वह स्थान भोगविलासके लिए अत्युत्तम है। ऐश-आराम के सारे ही सामान वहाँ भी मौजूद हैं। तुम्हें हर दिन, रातके समय, वहाँ आना होगा ; क्योंकि काम-शालामें, पराये घर रहकर, सुरत करनेकी मनाही लिखी है । कहा है :—

वहिन ब्राह्मणपूज्यवर्गनिकटे नद्यां च देवालये ।

दुर्गादौ च चतुष्पथे परगृहेऽरण्येश्मशानेदिवा ।

संकान्तौ शशीसंक्षयेऽयं शरदि श्रीप्ने ज्वरात्तौव्रते ।

सन्ध्यायाच्च परिश्रमेषु सुरतं कुर्यान्न विद्वान् क्वचित् ॥

विस्तीर्णोललिते सुधाववलिते चित्रादिनालंकृते

रम्ये प्रोन्नत चत्वरैऽगुरु महाभूपादिपुष्पान्विते ।

संगीतगंविराजिते स्वभवनं दीपप्रभाभासुरे ।

निःशंक सुरतं यथाभिलषितं कुर्यात्समंकांतया ॥

“अग्नि, ब्राह्मण, माँ-बाप, गुरु और बड़े भाई प्रभृति गुरुजनों के पास, नदी-किनारे, मन्दिरमें, किले वगैरः में, चौराहे पर, पराये घरमें, जंगलमें, श्मशान-भूमिमें, दिनमें, संकान्तमें, चन्द्रमाके क्षय कालमें, शरदऋतुमें, शीष्म ऋतुमें, ज्वर चढ़ा होने पर, व्रत रखने पर, सन्ध्या-समय और मिहनत करके—विद्वान् को सुरत या स्त्री-प्रसंग न करना चाहिये ।

“जो मकान मनोहर हो, लम्बा-चौड़ा हो, जिसमें सुन्दर सङ्केदी हो रही हो, तरह-तरहके चित्रादिसे सजा हो, जहाँ धूप वगैरः सुगन्धित पदार्थ खेये गये हों, फूलोंकी खुशबू आती हो, गाने