भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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बजानेके सितार तबला आदि बाजे रक्खे हों—ऐसे अपने मनोहर और ऊँचे मकानकी छत या आँगनमें, जो दीपकोंकी रोशनीसे देदीप्यमान हो, अपने समान स्त्रीसे, निःशंक होकर, इच्छानुसार, भोग करना चाहिये।

“प्यारी ! कामशास्त्रके रचयिताओंने जो कुछ भी लिखा है, वह बड़े अनुभवके बाद लिखा है। मैं रतिशास्त्रके विरुद्ध काम नहीं करता ; इसलिये आज रातको तुम मेरे बागमें आना। मैं तुम्हारी इन्तज़ारी करूँगा।” यह कहकर वह युवक चला गया।

उस युवकको कन्दर्पकला एक क्षणको भी छोड़ना नहीं चाहती थी। पहली मुलाकातमें ही उस नौजवानने उसके दिलमें गहरी जगह कर ली। एक तो वह रूपवान, बलवान, वीर्यवान और शौकीन छेला था ही ; दूसरे उसने उसे, कामशास्त्र-विशारद होने से, भोग-बिलास द्वारा सन्तुष्ट कर दिया, इसीसे वह उस पर जी जानसे फिदा हो गई। ऐसी प्रीतिको “अभ्यासिकी प्रीति” कहते हैं।

❁ “निसर्गजा या नैसर्गिकी, विषयजा और अभ्यासिकी” इस तरह मुख्य तीन तरहकी प्रीति होती हैं। नैसर्गिकी प्रीति अभ्यास से या माला, श्रव, मिठाई और कपड़े-गहने देनेसे नहीं होती, वह पूर्णजन्मके सम्बन्धसे होती है। वह बड़ी मजबूत मुहब्बत है। वह किसीके हज़ार चेष्टा करनेसे भी नहीं छूट सकती। वैसी प्रीति छोटी उम्रके दूल्ह-दुलहनमें नहीं हो सकती—१४। १५। १६ साल की कन्या और २०। २५ सालके लड़के की शादी होनेसे ही हो सकती है।

जो प्रीति इत्र, कुलेल, फूलमाला, गुलदस्ते, चन्दन-केशर और कस्तूरीके

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