शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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वह व्यभिचारी नवयुवक सदा कन्दर्पकलाको अपने क्राबूमँ रखनेकी अनेक चेष्टायें किया करता था। उसने सबसे पहले इस बातका पता लगाया कि, यह मुझ पर क्यों आसक्त हुई है ; क्योंकि इसके यहाँ धनकी कमी नहीं, धनके सिवा और भी किसी वस्तुका अभाव नहीं। यह हमारे शहरके सबसे बड़े सेठ की पुत्री है। इसका पति यहाँ नहीं है। उसे गये बहुत दिन हो गये और आजकल बसन्तका मौसम है—जान पड़ता है, इन्हीं कारणोंसे इसने मुझे अपनाया है। कहा है—
मार्गादि श्रान्तेदेहा चिरविरहवती मासमात्रप्रसूता ।
गर्भालस्या च नव्याज्वरकृततुता त्यक्तमानप्रसन्ना ॥
लेप, उत्तमोत्तम कपड़े, नाना प्रकारके गहने, लज्जित और ज्ञापकेदार मिठाइयाँ लेने-देनेसे होती है, उसे “विषयजा प्रीति” कहते हैं।
जो प्रीति शिकार खेलने जानेसे जंगलमें हो जाती है, जो मन्दिरोंमें देवदर्शनोंको जानेसे हो जाती है, जो सजघजकर एक दूसरेको रिझानेसे हो जाती है, जो मनोहर गाना सुननेसे हो जाती है और जो भ्रानन्ददायी छरतसे हो जाती है, उसे “अभ्यासिकी प्रीति” कहते हैं।
यशोव्रता और सिद्धार्थ (महान्मा बुद्ध) की प्रीति “नेसरंगी” थी। शकुन्तला और दुष्यन्तकी प्रीति शिकारेके समय हुई थी; अतः “अभ्यासिकी” थी। बहुतसे मर्द औरतोंके गाने पर और औरतें मर्दोंके गाने पर रीझकर प्रीति कर लेते हैं, वह भी “अभ्यासिकी प्रीति” कहाती है। कन्दर्पकला इस पुरुष की रूपच्छटा और छरत की कारीगरी पर रीझी थी, इसलिये हमने इसे “अभ्यासिकी” प्रीति कहा है।