भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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ज्ञाता पुष्पावसाने नवरतिसमये मेवकाले वसन्ते ।

प्रायः सम्पन्नरागा शृंगशिशुनयना स्वल्पसाध्या रते स्यात् ॥

मार्गं चलनेसे थकी हुई या राह भूली हुई, बहुत दिनोंसे पति-समागम न होने वाली, महीना-भरकी बच्चा जननेवाली, पाँच-छे महीनेकी गर्भवती, आलस्यवाली, नये बुखारवाली, मान-हीना, बहुत ही खुश रहने या हँसनेवाली, मासिक धर्मके बाद नहा कर उठी हुई, पहले-पहल जवानोंकी तरङ्ग आनेवाली, वर्षा-काल और वसन्त ऋतुमें—रूपवान, धनवान और बिलासी पुत्रों के हाथ, ऊपर लिखे लक्षणों वाली स्त्रियाँ, स्वयं कोशिश करने या दूतियाँ लगानेसे बड़ी आसानोंसे आ जाती हैं। खेर, अब मैं तरह-तरहके वाजीकरण और स्तम्भन योगोंको सहायतासे इसे अपनी क्रीतदासी बनाऊँगा ।

कई बरस तक हमारा गुणनिधि विदेशसे नहीं लौटा ; इधर कन्दर्पकला अपने धर्मसे पतित हो गई, पतिव्रतासे कुलटा हो गई । उसे रात-दिन अपने यार का ही ध्यान रहता था । दिन उसे एक युगके समान बितता था । साँक होते ही वह नहा-धोकर तैयार हो जाती और रातको सारे कुटुम्बके सो जाने पर, चोरद्वारसे निकल कर, अपने प्यारके पास, बिला नागा पहुँचती थी । अगर घरका कोई आदमी भूलके भी गुणनिधि का नाम ले लेता, तो उसके दिलमें काँटासा खटकता था । वह रात-दिन यही मनाती थी, कि गुणनिधि विदेशमें ही मर जावे या कभी न आवे । शास्त्रकारोंने कहा है कि, अच्छे कुलोंकी स्त्रियाँ