शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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भी सदा बापके घरमें रहने और पतिके अधिक समय तक विदेश में रहनेसे बगड़ जाती हैं। ऐसी कुलटा नारियोंको पतिका प्रदेशमें रहना अच्छा मालूम होता है। कहा है :—
पितृसदननिवासः संगतिः पुंश्लीभिः, प्रवसनमथ रोगो वार्द्धकं चापि पत्युः । वसतिरपरपुंभिः दुष्टशीलैरवश्यं, क्षतिरपि निजवृत्तेर्योषितां नाशहेतुः ॥ दुर्दिवसे वनतिमिरे दुःसन्न्वरासु वनवीर्थसु पत्युर्विदेशगमने परमसुखं जघन चपलायाः ॥
सदा पीहरमें रहनेसे, व्याभिचारिणी स्त्रियोंकी सुहृदत्तसे, पतिके प्रदेशमें रहनेसे, पतिके सदा रोगी रहनेसे, पतिके बूढ़े होनेसे, दुष्टव्रिष्ट पेयाश-तबियत लोगोंके वशमें रहनेसे और अपनी आजीविकाके मारे जानेसे स्त्रियाँ खराब हो जाती हैं।
आकाशमें बादलोंके छाये रहनेसे, घोर अँधेरेसे, सुनसान जन्हीन गलियोंसे और पतिके विदेशमें रहनेसे परपुरुषता स्त्रियों को परम सुख होता है।
अब जरा गुणनिधिकी खबर भी लेनी चाहिये। जिस दिनसे वह अपनी स्त्री कन्दर्पकलाको छोड़कर विदेश गया, उस दिनसे उसे एक दिन भी सुखकी नींद न आई। जब कभी उसे कामसे फुर्सत मिलती, वह अपनी प्यारीको याद करता। राते तो उसे