भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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करवटे' बदलते और तारे गिन्ते ही वीतती थीं। खैर, बरस-डेढ़-बरस चलकर, वह रोम नगरमें पहुँचा। भगवान्की दयासे उसका सारा माल गहरे मुनाफ़ेसे विक गया। अब उसे अपनी प्यारीसे मिलनेकी उत्कण्ठा औरभी बढ़ गई। एक दिन शरदुकी चाँदनी रातमें, सोते-सोते उसे अपनी प्राणप्यारीसे मिलनेकी इच्छा इस ज़ोरसे हुई, कि उसने उसी समय नौकरोंको असबाव वाँधकर जहाज़ पर रखने और तत्क्षण वहाँसे चल देनेका हुक्म दिया। हुक्म पाते ही नौकरोंने सारा सामान जहाज़ पर लाद दिया। सब लोग सवार हो गये और जहाज़ने भारतकी ओर रुख किया। कुछ दिनोंमें, समुद्र-यात्राकी तकलीफ़ें उठाता हुआ, वह अपनी सुसरालमें आ पहुँचा।

जिस दिन गुणनिधि अपनी सुसरालमें आया, उस दिन उसकी सुसरालमें कोई महोत्सव मनाया जा रहा था। कुटुम्बके सब लोग उसीमें लगे हुए थे। यह भी उनमें शामिल हो गया। उसके सास-ससुर और साली-सरहज वगैरह उसके आनेसे परमानन्दित हुए; पर कन्दर्पकलाका चेहरा उल्टा उतर गया। वह मन-ही-मन बहुत दुःखी हुई, पर प्रकटमें कुछ न कह सकी। उसके मन-मन्दिरमें तो उसका यार हँस-खेल रहा था। इसके आजानेसे उसका सारा मज़ा किरकिरा हो गया। इसका आगा उसे अच्छा न लगा।

रातके समय, बहुत दिनोंका बिछुड़ा हुआ गुणनिधि, देव-मन्दिरके समान सजे हुए महलमें, बड़ी उमंगके साथ, अपनी