शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
पृष्ठ 413, कुल 544 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३४८ )
प्राणप्यारीसे मिलने गया । वहाँ अति सुन्दर कमनीय धवल शय्या बिछी हुई थी । चारों ओर काफ़ी रौ बत्तियाँ जल रही थीं । सुगन्धित धूप हर ओर महक रही थी । गुलाब, झस, हिनै और मोतियेके इत्रोंकी खुशबू उड़ रही थी । चन्दनके लिङ्कावके कारण मलय मारुतका आनन्द आ रहा था । कमरेके खम्भोंमें जड़े हुए मणि-माणिक रोशनीमें जगमगा रहे थे । उस समय वह कयरा इन्द्रभवनको लजा रहा था । गुणनिधि अपनी परम-प्रियाको आलिङ्गन कर लेट रहा, पर कर्दूपकलाका दिल तो अपने प्यारे यारकी यादमें लगा हुआ था । उसे अपना व्याहता पति कालसर्पके उगले हुए विषके समान मालूम होता था । वह बारम्बार अपनी कमलसौ आँखोंको बन्द करके, योगिनकी तरह, अपने यारका ध्यान करती थी । वह हर क्षण निःश्वास फँक-फँककर, अपनी आतुरता और शोक प्रकट करती थी ; परन्तु सरलचित्त गुणनिधि इस भेदको न जानता था ; इसलिये वह चुम्बन कर, शृंगारके हाव-भाव बता, अपने सरल और सप्रेम हृदयसे मोठे-मोठे शब्दोंमें रतिकैलकी प्रार्थना करने लगा ; पर वह वज्रहृदया कुलटा कामिनी जरा भी न पसीजी । उसने पतिके प्रेमरससे पूर्ण शब्दोंका कुछ भी उत्तर न दिया ; तब कामातुर पतिने उसकी साड़ी खींच ली । वह अपने अंगोंको ढककर और सुकड़ कर एवं पर्वागसे नीचे उतर कर एक कोनेमें जा बैठी ; क्योंकि उसे तो अपने यारका ध्यान था । वह पतिके साथ भोग-विलास करना पसन्द न करती थी । भोले-भाले गुणनिधिने