भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( २६ )

एताः स्वलङ्कलयसंहतिमेष्वलोत्य-

मंकारन्तुपुरवात्तदराजहंस्यः ॥

कुर्वन्ति कस्य न मनो विवशं तस्यो

विप्रस्तमुग्रहरिणीसदृशैः कटाक्षैः ॥८॥

चन्द्रचल कङ्कन, डीली कौधनी और पायजेबोंके घुँवरुओंकी मधुर मङ्ककारसे राजहंसोंको शरमानेवाली नवयुवती सुन्दरियाँ, भयभीत हिरनीके समान कटाक्ष करके, किसके मनको विवश नहीं कर देतीं ? ॥८॥

कर्धनी और पायजेब प्रभृति अलङ्कारोंके मधुर-मधुर शब्दों-से राजहंसनियोंका निरादर करनेवाली नवयुवतियाँ, जब भङ्गकी हुई भोली हिरनीकी तरह अपनी तीखी नज़रका तीर चलाती हैं, तब दड़े-बड़े बहादुर उनके वशीभूत होकर उनकी गुलामी करने लगते हैं । मनुष्य तो कौन बीज है, देवता तक ऐसो कामिनियोंके कटाक्ष-घाणोंसे पराजित हो जाते हैं । अब इनकी निगाहके तेज तौरसे जो परास्त न हो, अपनी रक्षा कर ले, उसे हम क्या कहें, सो हमारी समझमें नहीं आता । भोले-भाले पाठक ! इनके कटाक्षों की मारको मामूली मार न समझें । महाकवि दाग कहते हैं और ठीकहो कहते हैं :—

तीर तेरा मिजुगोंसे बढ़कर नहीं ।

कुछ खटकते हैं, इसी ज़रतरेसे हम ॥