भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( २७ )

तेरी भौँहों में जो काट है, वह तेरे तीरमें नहीं। इसीलिये मुझे तीरसे तेरे भौँह रूप नशतरका हर सयय खटका लगा रहता है। मतलब यह कि, तीरकी मारका इलाज है; पर कामिनीके कटाक्ष-वाणका इलाज नहीं।

दोहा ।

नृपुर किंकन किंकिणी, बोलत अमृत बैन ।

काको मन नहि बस करत, मृगनैननिके नैन ॥८॥

सार—नाजिनियोंके निगाहे तीरसे न घायल होनेवाला करोड़ोंमें कोई एक होता हो, तो होता हो !

8. Which mind is there that does not go out of control by the casting of the eyes like that of a frightened hind of the young woman, the sounds of whose restless bracelets and the waistchain and the tinklings of whose anklets defeat the sweet sound of swans even.

कुकुमपंककलंकितदेहा गौरपयोधरकम्पितहारा ।

नृपुरहंसरणत्पदपद्मा कं न वशीकुरुते सुवि रामा ॥९॥

जिसकी देह पर केसर लगी है, जिसके गोर-गोर स्तनोंपर हार झूल रहा है और नृपुररूपी हंस जिसके चरणकमलोंमें मधुर-