शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २८ )
मधुर शब्द कर रहे हैं,—ऐसी सुन्दरी इस पृथ्वी पर किसके मनको वशमें नहीं कर लेती ? ॥६॥
खुलासा—जिसकी देह पर केसर लगी है, जिसके सघन पीनपयोधरों पर मोतियोंका हार धीरे-धीरे हिल रहा है, जिसके कमल-जैसे चरणोंसे बाजेकी मधुर-मधुर झंकार निकल रही है, वह सुन्दरी इस जगत्में किसीको भी अपने अधीन किये बिना नहीं छोड़ती ; जो उसकी नज़रों तले आता है, वही उसका गुठाम हो जाता है । परन्तु जो पुरुष ऐसी मनो-मोहिनी नारीके वशमें नहीं होता, उसके रूपलावण्य और नाज़ो-अर्दा पर नहीं मर मिटता, वह सच्चा शूरवीर और मोक्ष का अधिकारी है ।
दोहा ।
हार हलें कुचकनक लग, केसर रंजित देह ।
नृपुरश्चनि पदकमलकी, केहि न करें बस येह ? ॥६॥
सार—जिनके गोरे-गोरे बदन पर केसर लगी है, जिनकी नारंगियोंसी सुगोल छातियों पर मोतियोंके हार हिल रहे हैं और जिनके चरणकमलोंकी पायज़ेवोंसे छमा-छमकी मीठी-मीठी मनोहारिणी आवाज़ें आती हैं, वे मृग-नयनों किते अपने वशमें नहीं कर लेतीं ?