शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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हुआ । बारम्बार, पागलकी तरह वृक्षोंसे बातें करने लगा । अगर हवाके चलनेसे पत्ता भी खड़खड़ाता, तो वह धुन बाँधकर देखने लगाता और चौँककर कहने लगाता,—“अबके मेरी प्यारी—हृदयहारिणी सुन्दरी आई ।” पर जब कोई न आता, तो निराश होकर पछताने लगाता । चूँकि शुक्लपक्ष—उजेल पाख था, चन्द्रमाकी चाँदनी अपनी अपूर्व छटा दिखा रही थी । मन्दी-मन्दी हवा चल रही थी, स्थान भी अतीव रमणीय था, चारों ओर सुहावने वृक्ष-ही-वृक्ष थे । चम्पा, चमेली, केतकी और गन्धराजकी सुगन्धसे वन-का-वन महक रहा था । कामोत्तेजक सारे सामान मौजूद थे । इसलिये ज्यों-ज्यों रात बीतती थी, उसका हृदय कामाग्नि और वियोगगनिसे जला जाता था । निदान वह अधीर हो गया । कामके तापको सह न सका । अगर उसकी प्यारीका मुखचन्द्र उसे दीख जाता, तो उसकी अग्नि शान्त हो जाती । पर उस रातको वह न आई, इसलिये घोर दुःखसे दुःखी होकर, एक भाड़से लिपटी हुई लतासे फाँसी खाकर और अपने अमूल्य प्राण त्यागकर यमसदनका राही हुआ । उस प्रेमीके प्राणत्याग कर चुकनेके थोड़ी देर बाद ही, कन्दर्पकला उस उपवनमें पहुँची । उसने अपने हृदयके हार, प्राणप्यारको मोतियोंकी मालाओं और रत्नजटित आभूषणोंसे अलंकृत देखा । चन्द्रमाकी चाँदनीमें सारे जूवर चमाचम चमक रहे थे । उसका सुन्दर शरीर रंगबिरंगे बहुमूल्य वस्त्रोंसे सुशोभित था, परन्तु वह अपूर्व पदार्थ—शरीरका रत्न, समस्त सुखोंको