भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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भोगनेवाला—चैतन्य-चन्द्र उसकी देहसे सदाके लिए अलग हो चुका था। हँसा उड़ गया था, खाली देह लटक रही थी। घरमें रहनेवाला गायब हो गया था, खाली घर पड़ा था। प्राणविहीन देह लटक रही थी। उस लाशके आस-पास कुछ पशुपक्षी उड़ रहे थे। फाँसी लगाते समयकी आवाज़ सुनकर पक्षी जाग पड़े थे और उस लाशके ईर्ष-गिर्द जमा हो गये थे। इन पशुपक्षियोंको देखकर वह नाना प्रकारकी आशंका करने लगी। उसके चित्तमें एक-पर-एक संकल्प-विकल्प उठने लगे। वह अत्यन्त भयभीत हुई। खैर, अन्तमें वह उसके पास पहुँची और उसके गले लगनेकी आशासे झुकी, तो उसे मरा हुआ पाया। बस, वह कुलटा तत्क्षण ज़मीनपर गिर कर मूर्च्छित हो गई। थोड़ी देर पड़ी रहनेके बाद, उसे स्वतः ही होश हुआ। वह उठकर उस लाशके पास बैठ गई और चिलाप करने लगी। जिस तरह गूँजते हुए भौरोंके बैठनेसे कोमल लता नीचे मुक जाती है; उसी तरह आह ! कहते ही वह फिर पृथ्वी पर गिरकर बेहोश हो गई। इस बार बहुत देरके बाद उसे होश हुआ। होश होते ही वह ज़ार-ज़ार रोने और क्रूकने लगी। उस लाश पर नज़र पड़ते ही वह अचम्बित और दुःखित हो कहने लगी—“हाय ! मेरे प्राणाधार ! हा ! मेरे नयनानन्द ! प्यारे ! आप कहाँ सिधारे ? नाथ ! इस दासीका साथ क्यों छोड़ दिया ? मेरे जीवन-सर्वस्व ! आपका उदार चित्त ऐसा अनुदार क्यों हो गया ? भहाराज ! इस दासीका अपराध क्षमा करते ! प्राणेश ! कुछ तो धीरज धरते। हा ! बिना कुछ कहे,