भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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बिना बोले, बिना मिले, इस दासीको सदाके लिए अनाथ करके, चले जाना उचित न था। प्यारे! अब यह अभोगिन आपका मुखचन्द्र कहाँ देखेगी? हाय! यह क्या हुआ! मेरे प्यारे! प्रीतम! प्राणवल्लभ! हृदयके हार! सुनो, यह दासी कबकी पुकार रही है? हा! आप ऐसे कठोर कबसे हो गये? हा! प्राणेश! मुझ मन्दभागिनीको रोते-कलपते और तड़फते देख, आपको जरा भी दया नहीं आती! हाय! हाय! कुछ तो मुहब्बत निबाही होती। बिस्चोर! एकवार तो दौड़कर गले लगो। प्यारे! एकवार तो मीठी और रसीली बातें और सुना दो। यह दासी भी आपके पास ही आती है।” यह कहती हुई वह बेहोश होकर गिर पड़ी। इसके कुछ देर बाद धीरज धरकर अपने प्रेमीका मुँह चूमने लगी-मानों उस मुँहमें जान आ गई हो। इसके बाद उसने अपने मुँहका पान भी उसके मुँहमें रख दिया और बारम्बार उसके खूबसूरत चेहरे को देखने लगी। फिर कभी रोने लगती और कभी धीरज धरके कहती—“प्यारेको आँखों-भर देख तो लूँ, जो होना था सो तो हो ही गया।

अब एक नई बात सुनिये :—ईश्वरकी गति बड़ी ही विचित्र है। उस लीलामयकी लीलाका पार नहीं। वह बड़ा विलक्षण है। उसकी रचनाका भेद पाना असम्भव है। कोई नहीं कह सकता कि, थोड़ी ही देरमें क्या होनेवाला है। उस मुर्देके शरीर पर चन्दन-अरगजा चर्बित था। इस प्रभुति 'बुधश्रवदार' चीज़ोंसे उसके कपड़े महक रहे थे। उसके बदन पर के सुगन्धित पदार्थों से