भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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पत्ता भी नहीं हिलता, इससे मालूम होता है कि, जगदीशकी ऐसी ही इच्छा थी कि, उस भ्रष्टा कुलटाको दण्ड मिले, और वह जीवन-भर ऐसे कुकर्म करने योग्य न रहे। आगे देखिये क्या-क्या गुल खिलते हैं।

चेहरेकी सुन्दरता नष्ट होने या नाक काट जाने पर, कन्दर्पकला उस लाशको वहीं छोड़कर, वहाँसे नौ दो ग्यारह हुई और घर पहुँचकर चुपचाप अपने पतिके पास सो रही। कुछ देर लेटी रहनेके बाद, उसने त्रिया-चरित्र रचना शुरू किया। सोते-सोते मानो अचानक चौँक उठी हो—इस तरहका भाव बनाकर चिल्लाने लगी—“हायर! हाय! इसने मेरी नाक काट ली, कोई दौड़ो, मुझे बचाओ।” इस तरहकी भयानक चीख सुनकर घरके लोग दौड़े आये। इस आवाज़को सुनकर बेचारा अनजान गुणनिधि भी जाग उठा। वह आँखें खोल कर क्या देखता है कि, लोग उसे चारों ओरसे घेरे हुए खड़े हैं और क्या हुआ ! क्या हुआ ! का शोर कर रहे हैं। उसकी अपनी विवा-हिता स्त्री कन्दर्पकला कह रही है—“आप लोग नहीं देखते, इसने मेरी नाक काट ली है ? मुझे बचाइये, नहीं तो अब मेरी जान भी नहीं बचेगी, यह मुझे मार डालेगा।” ये बात सुनकर गुण-निधिका ससुर और अन्य लोग कहने लगे—“तुमने यह क्या

नाईको सज़ा देनी थी, उसे मुँह दिखाने योग्य न रखना था ; इसीसे ऐसी अपूर्ण-देखी न सुनी-घटना घटी। ईश्वर पापियोंको इसी तरह दण्ड देता है।