शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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वह वन-का-वन सुगन्धिभय हो रहा था। कोसों तक सुगन्धि फैल रही थी। उस वनमें एक प्रेत भी रहता था। उसने सुगन्ध पर मोहित होकर, उसके शरीरमें अपना घर बना लिया ; यानी वह मुर्देके भीतर घुस गया। ज्योंही कन्दर्पकलाने अपने यारकी लाशसे आलिङ्गन किया, उसका होट अपने मुँहमें रखकर चूसने लगी, त्योंही उस मुर्दे में घुसे हुए प्रेतने उस डुटाकी नाक काट खाई। इस तरह दुराचारिणी स्त्रीने अपने कुकर्मका फल पाया *। संसारमें जगदीशकी इच्छा बिना एक
❖ बहुसते नई रोयनीवाले बाबू इस घटनाको कल्पित और मनगढ़न्त समझेंगे। उनके लिए हम अभी दस-पाँच दिनकी ऐसी ही प्रकचकानेवाली नई घटना, जो कल-परसों ता० २०१२५ जुलाई सन् १९२५ के हिन्दी प्रवक्वारोंमें छपी है उनाते हैं, उससे मालुम हो जायगा कि ईश्वरको लोहा कैसी विचित्र है। वह पापियोंको किस तरह दण्ड देता है। भागलपुरमें रहनेवाला एक नार्ड अपनी पुत्रीको लिये लानेके लिए पुत्रीकी घरमालमें गया। लड़कीको लेकर वह पेंदल किसी जङ्गलमें होकर आ रहा था। उसकी पुत्री गर्भवती थी और उसका रूप-लावण्य अपूर्ण था। चेहरेसे नूर टपका पड़ता था। पिताकी नीयत पुत्री पर बिगड़ी। उसने पुत्रीकी राजीते या बेराजीते—पता नहीं—उससे भोग किया। उसकी लिंगेन्द्रिय क्षमकी पुत्रीकी योनिमें अटक गई। उसने इन्द्रिय निकालनेकी इज्जतें कोपियों कीं ; मगर वह कामयाब न हुआ। वह दोनों अप्रयत्नाले जाये गये। डाक्टरोंने उन्हें प्रलग किया। गर्भका बन्धा मर गया, वह भी निकाला गया। क्या किसीने आज तक उना है कि, पुरुषकी लिंगेन्द्रिय श्वाकी योनिमें कभी अटक हो? ईश्वरको उस महा ब्रह्म