भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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शुद्धांशतक

हँसा उड़ गया था, खाली देह लटक रही थी। वह नाना प्रकारको आशंका करने लगी। वह उसके गले लगनेकी आशासे मुड़ी, तो उसे मरा हुआ पाया; तब वह अचम्बित और दुःखित हो कहनेलगी—'हाय ! मेरे प्राणाधार ! हा ! मेरे नयनानन्द ! आप कहाँ सिंधारे ? ज्योंही कन्दपकला अपने यारका होट अपने गर्दियों लेकर चलने लगी, त्योंही समू मंदिरमें घुसे हुए घेतने उस दुष्टाकी नाक झूट खाई।

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