शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
शुद्धांशतक
हँसा उड़ गया था, खाली देह लटक रही थी। वह नाना प्रकारको आशंका करने लगी। वह उसके गले लगनेकी आशासे मुड़ी, तो उसे मरा हुआ पाया; तब वह अचम्बित और दुःखित हो कहनेलगी—'हाय ! मेरे प्राणाधार ! हा ! मेरे नयनानन्द ! आप कहाँ सिंधारे ? ज्योंही कन्दपकला अपने यारका होट अपने गर्दियों लेकर चलने लगी, त्योंही समू मंदिरमें घुसे हुए घेतने उस दुष्टाकी नाक झूट खाई।
पृष्ठ ३५६
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वह वन-का-वन सुगन्धिभय हो रहा था। कोसों तक सुगन्धि फैल रही थी। उस वनमें एक प्रेत भी रहता था। उसने सुगन्ध पर मोहित होकर, उसके शरीरमें अपना घर बना लिया ; यानी वह मुर्देके भीतर घुस गया। ज्योंही कन्दर्पकलाने अपने यारकी लाशसे आलिङ्गन किया, उसका होट अपने मुँहमें रखकर चूसने लगी, त्योंही उस मुर्दे में घुसे हुए प्रेतने उस डुटाकी नाक काट खाई। इस तरह दुराचारिणी स्त्रीने अपने कुकर्मका फल पाया *। संसारमें जगदीशकी इच्छा बिना एक
❖ बहुसते नई रोयनीवाले बाबू इस घटनाको कल्पित और मनगढ़न्त समझेंगे। उनके लिए हम अभी दस-पाँच दिनकी ऐसी ही प्रकचकानेवाली नई घटना, जो कल-परसों ता० २०१२५ जुलाई सन् १९२५ के हिन्दी प्रवक्वारोंमें छपी है उनाते हैं, उससे मालुम हो जायगा कि ईश्वरको लोहा कैसी विचित्र है। वह पापियोंको किस तरह दण्ड देता है। भागलपुरमें रहनेवाला एक नार्ड अपनी पुत्रीको लिये लानेके लिए पुत्रीकी घरमालमें गया। लड़कीको लेकर वह पेंदल किसी जङ्गलमें होकर आ रहा था। उसकी पुत्री गर्भवती थी और उसका रूप-लावण्य अपूर्ण था। चेहरेसे नूर टपका पड़ता था। पिताकी नीयत पुत्री पर बिगड़ी। उसने पुत्रीकी राजीते या बेराजीते—पता नहीं—उससे भोग किया। उसकी लिंगेन्द्रिय क्षमकी पुत्रीकी योनिमें अटक गई। उसने इन्द्रिय निकालनेकी इज्जतें कोपियों कीं ; मगर वह कामयाब न हुआ। वह दोनों अप्रयत्नाले जाये गये। डाक्टरोंने उन्हें प्रलग किया। गर्भका बन्धा मर गया, वह भी निकाला गया। क्या किसीने आज तक उना है कि, पुरुषकी लिंगेन्द्रिय श्वाकी योनिमें कभी अटक हो? ईश्वरको उस महा ब्रह्म
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पत्ता भी नहीं हिलता, इससे मालूम होता है कि, जगदीशकी ऐसी ही इच्छा थी कि, उस भ्रष्टा कुलटाको दण्ड मिले, और वह जीवन-भर ऐसे कुकर्म करने योग्य न रहे। आगे देखिये क्या-क्या गुल खिलते हैं।
चेहरेकी सुन्दरता नष्ट होने या नाक काट जाने पर, कन्दर्पकला उस लाशको वहीं छोड़कर, वहाँसे नौ दो ग्यारह हुई और घर पहुँचकर चुपचाप अपने पतिके पास सो रही। कुछ देर लेटी रहनेके बाद, उसने त्रिया-चरित्र रचना शुरू किया। सोते-सोते मानो अचानक चौँक उठी हो—इस तरहका भाव बनाकर चिल्लाने लगी—“हायर! हाय! इसने मेरी नाक काट ली, कोई दौड़ो, मुझे बचाओ।” इस तरहकी भयानक चीख सुनकर घरके लोग दौड़े आये। इस आवाज़को सुनकर बेचारा अनजान गुणनिधि भी जाग उठा। वह आँखें खोल कर क्या देखता है कि, लोग उसे चारों ओरसे घेरे हुए खड़े हैं और क्या हुआ ! क्या हुआ ! का शोर कर रहे हैं। उसकी अपनी विवा-हिता स्त्री कन्दर्पकला कह रही है—“आप लोग नहीं देखते, इसने मेरी नाक काट ली है ? मुझे बचाइये, नहीं तो अब मेरी जान भी नहीं बचेगी, यह मुझे मार डालेगा।” ये बात सुनकर गुण-निधिका ससुर और अन्य लोग कहने लगे—“तुमने यह क्या
नाईको सज़ा देनी थी, उसे मुँह दिखाने योग्य न रखना था ; इसीसे ऐसी अपूर्ण-देखी न सुनी-घटना घटी। ईश्वर पापियोंको इसी तरह दण्ड देता है।
श्रृङ्गारशतक
इसने मुझे निरपराधिनीकी नाक काट ली है। मुझे बचाइये, नहीं तो यह मुझे जानसे मार डालीगा।
Popular Press—Calcutta.
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किया? अफ़सोस! तुमने इस निरपराधितोकी नाक बुथा ही काट ली! इसका क्या अपराध था?" ये बातें सुनते ही गुणनिधि का चेहरा पीला पड़ गया। वह हक्का-बक्का हो गया। होश-हवास जाते रहे। उसके मुँहसे एक अक्षर भी न निकला। उधर कन्दर्पकला फूट-फूटकर रो रही थी। उसके पिता और चाचा वगैरः गुणनिधिसे नाक काटने की वजह पूछ रहे थे। इतनेमें सबेरा हो गया। गुणनिधिके सुसरालवाले कोतवालीमें दौड़े गये; रिपोर्ट लिखाई। पुलिसने आकर गुणनिधिको गिरफ़्तारकर लिया। फिर वह राजाके सामने पेश किया गया। राजाने सब तरहसे पूछ-ताछ और गवाही वगैरः लेकर गुणनिधिको १ सालकी क़ैद और दस हजार रुपया जुर्माना किया। गुणनिधिनो एक शब्द भी अपनी ज़वानसे नहीं कहा।
यह बात सारे शहरमें फैल गई। हर आदमीके मुँहपर यही चर्चा थी कि, नगरसेठके ज़माईने अपनी स्त्रीकी नाक काट ली। वह कल ही परदेशसे आया था। न्यायके समय वह चोर, जो रातको कन्दर्पकलाके पीछे लगा था, अदालतमें मौजूद था। उसने देखा कि, निरपराध गुणनिधि बुथा मारा जाता है—बेचारेको बुथा इतनी कड़ी सज़ा दी जाती है। उसके दिलमें जोश आया और उसने सारी घटना राजाको कह सुनाई। राजा अपने अब्दमियोकै साथ स्वयं उपवनमें गया। चोरने कन्दर्पकलाके पदचिह्न, अपने छिपनेका स्थान और कन्दर्पके यारकी लाश ये सब दिखा दिये। साथ ही उस मुर्देके मुँहमेंसे कन्दर्पकलाकी नाक
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निकालकर दिखा दी और उस लाशपर पड़ी हुई खूनकी बूँदोंपर भी ध्यान दिलाया । सारी घटना राजाकी समझमें आ गई । राजाने गुणनिधिको दण्ड-मुक्त किया, कन्दर्पकलाको जेलखाने भेजा, चोरको कई लाख रुपये इनाम दिये और गुणनिधिको अपना दीवान बनाकर, उसे अपनी कन्या व्याह दी । बुरेको बुरा और भलेको भला फल मिला ।
नतीजा इस कहानीका यही है कि, अधिकांश स्त्रियाँ अत्यन्त कुटिल, क्रूर-कर्म करनेवाली, लज्जाहीना और चञ्चलमति होती हैं । ये लोग अपने पति, पिता-माता, भाई-बन्धु और अपनी पेटकीओलाद तकसे द्रोह करने और उनका सर्वनाश करनेमें नहीं चूकतीं ।
जिस पतिने कन्दर्पकलाकी मुहब्बतमें, उसे खुश करनेमें, कोई बात उठा न रखी ; जिस पिताने उसे पालने-पोषने और पढ़ाने-लिखानेमें कोई चुटि न की, उसकी शादीमें करोड़ों खर्च कर दिये—उन पिता और पतिकी इज्जतका उसने कुछ भी न्ययाल न किया । इससे बढ़कर और दौरात्म्य क्या हो सकता है ? कुल्ला नारी कुलगौरव-हानि, लोकनिन्दा, जेल और फाँसी किसीकी भी परवा नहीं करती । ऐसी नारीसे जगदीश बचावे ! किसीने कहा है :—
आवर्त्तः संशयानामविनयभवनं पत्तनं साहसानां दोषाणां सन्निधानं कपटशतगृहं क्षेत्रमप्रत्ययानाम् । दुर्प्रबिं यन्महदभिर्नवरवृषभैः सर्वमायाकरगंड व्रीर्यत्र केन लोके विषममृतयुतं धर्मानाशाय सुष्ठम् ? ॥
भुङ्गारशतक
राजाने गुणनिथिका वरदमुक्त किया, कन्दुकलाको जेलखान भेजा, चोरको कड़े लाख रुपये इनीस दिये और गुणनिथिका अपना दोषान बताकर, उसे अपनी कन्या भी ब्याह दी । वुरको दुरा और भलको भला फल मिला । पृष्ठ ३५५।६०
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सन्देहोंका भँवर, अवितयका घर, साहसका नगर, दोषोंका खज़ाना, कपटका शतगृह, अविश्वसका क्षेत्र, बड़े-बड़े नरश्रेष्ठोंके भी क्रावूमें न आनेवाला, सारी मायाको पीटला—स्त्री-रूपी यंत्र, जिसमें विष और अमृत दोनों ही हैं, धर्मनाशार्थ, किसने बनाया ?
—*—
श्रपसर ससे दुरादस्मात्कटाक्षविधानला—
त्यक्तित्विषमायोपित्स्पर्शाद्विलासफलाभूतः ॥
इतरफणिना दृष्टः शक्यश्चिकित्पितुमौषधे—
श्रुतुरवनिताभोगिघ्रस्तं त्यजन्तिहि मन्त्रिणः ॥८३॥
हे मित्र ! सहज ही क्रूर, विलास रूपी फण वाले और कटाक्षरूपी विषाग्नि धारण करनेवाले स्त्री-रूपी सर्पसे दूर भाग ; क्योंकि और सर्पोंका काटा हुआ तो मन्त्र तथा औषधियोंसे अच्छा हो सकता है ; पर चतुर स्त्री-रूपी सर्पके उसे हुए को भाड़-फूँक वाले गारुड़ी भी छोड़ भागते हैं ॥८३॥
खुलासा—स्त्री सर्पके समान है। इसका विलास इसका फण और कटाक्ष विषाग्नि है तथा यह स्वभावसे ही सर्पके समान क्रूर या विषैली है। यह स्त्री-सर्प और सर्पोंसे अधिक भयङ्कर है ; क्योंकि और सर्पोंका खाया हुआ मनुष्य मन्त्र या दवा अथवा भाड़फूँकसे कदाचित अच्छा हो भी जाता है ; पर
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इस सर्पके खायेका तो इलाज ही नहीं । इसका काटा हुआ भी, कालसर्पके काटे हुए की तरह, न खेळता है और न बकरता है ।
उस्ताद ज्ञाक फरमाते हैं :—
इसा हो कालेने जिसको काफिर
तो वह फिर्सेके असरसे खेले ।
दहानो गेसूका तेरा मारा,
न मुँहसे बोले न सरसे खेले ॥
मसल मशहूर है, कालेका काटा हुआ नहीं खेळता— नहीं अच्छा होता । फिर तेरे मुँह और जुलफोंका काटा हुआ आदमी यदि मुँह से नहीं बोलता और सरसे नहीं खेळता, तो क्या आश्चर्य है ?
महात्मा कबोर भी कहते हैं :—
नागिनके तो दोष फन, नारीके फन बीस ।
जाको डस्यो न फिर जिये, मरिहै विश्वा बीस ॥
कामिनि काली नागिनी, तीन लोक मंकार ।
नाम-सनेही ऊबरा, विषिया खाये फार ॥
नारी निरखि न देखिये, निरखि न कीजै दौर ।
देखत ही तैं विष चढ़ै, मन आवै कलु और ॥
खी-मात्र नागिन-स्वरूपिणो हैं । जैसी ही अपनी खी,
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वसी ही पराई । विष तो सभीमें होता है । विषका अपना और पराया क्या ? मनुष्य अपने विषसे भी मरता है और पराये विषसे भी । अपने कूर्प में गिरनेसे भी डूब जाता है और पराये कूर्प में गिरनेसे भी । ख़ियोंसे सुखकी आशा करना, मृगमरीविकामे जल पानेकी आशा करनेके समान है । "भामिनी-चिलास"-रचयिता पण्डितेन्द्र जगन्नाथ महाराज कहते हैं और सच कहते हैं :—
अलकाः फणिशवतुल्यशीला
नयनांता परिपुखितेषुलीलाः ।
चपलोपमिता खलु स्वयं यावत
लोकै सुखसाधनं कथं सा ? ॥
जिस की अलकावलि सौंपके बच्चेके से ख़माव वाली है और जिसकी आँखोंके कटाक्ष सपुखवाणों की तरह लीला करने वाले हैं और जिस की ख़यं विद्युत्तुलतासे उपमा दी जाती है, हा ! वह खी इस लोकमें किस तरह सुखदायी हो सकती है ?
सार्रांश यही है कि, स्त्रियाँ नागिनोंसे भी अधिक भयङ्कर हैं, अतः अपना भला चाहने वालोंको इनसे दूर रहना चाहिये । इनमें सुख नहीं, घोर दुःख है ; अमृत नहीं, हालहाल विष है । सपंके काट्टेकी दवा है, पर इनके काट्टेकी दवा नहीं ।
( ३६४ )
देहा ।
मन्त्र-यन्त्र-शौषधनते, तजत सर्प विष लाग ।
यह क्यों हूँ उतरत नहीं, नारि-नयनको नाग ॥८३॥
सार—स्त्री-रूपी सर्पसे दूर रहो, क्योंकि उसके काटेका इलाज नहीं है ।
83. O my friend, keep yourself aloof from a woman who is like a serpent. Both are crooked and cruel by nature and the oblique glances of the woman are like the flames of an arrow and whose gay activities are her hood, Serpent-bite may be cured by medicine, but even the charmers give them up who are bitten by this serpent-like clever woman.
—❧—
विस्तारितं मकरकेतनधीवरेण
स्त्रीसन्नितं बडिशमन भवाम्बुराशौ ॥
तेनाचिरात्तदधराभिषलोलभत्य-
मत्स्यान्विच्छप्य स पचत्यनुरागवहौ ॥८४॥
इस संसार-रूपी समुद्रमें कामदेव-रूपी धीमरने स्त्री-रूपी जाल फैला रक्खा है । इस जालमें वह अचराभिष-लोभी पुरुष-रूपी मछलियों को, शीघ्रतासे, खोंच-खोंच कर, अनुराग-रूपी अग्निमें पकाता है ॥८४॥
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खुलासा—क्या अच्छा रूपक है? इसमें सागर “संसार-सागर” है। मछली पकड़नेवाला मछुआ या धीमर स्वयं “कामदेव” है। मछली पकड़नेका जाल “खी” है। मछलियाँ “पुरुष” हैं। उनका चारा, जिसके लोभसे पुरुष-रूपो मछलियाँ जालमें फँसती हैं, “अधरामिप” है। मछलियोंको, भाग जानेके डरसे, शीघ्र ही पका डालने को अग्नि “अनुराग” है।
अजब मजेदार मामला है। कामदेव-धीमर बड़ा ही चालाक है। वह पुरुष-रूपी मछलियोंके फँसानेके लिये जाल और चारा प्रभृति सभी सामान लेस रखता है। एकबार फँस कर मछलियाँ निकल न भागे, इसलिये वह आग भी तैयार रखता है। इधर मछली जालमें फँसी और उधर आग पर रखी। ऐसे चालाक धीमरके जालमें फँसकर कौन बच सकता है? तात्पर्य यह कि, एक बार इश्क या प्रेममें फँसने पर, पुरुष निकल नहीं सकता। जब तक जालमें न फँसे, तभी तक ख़ैर है। अतः जो पुरुष कामदेव के जालमें फँसकर प्राण न गँवाना चाहें, वे कामदेवके “स्त्री-जालसे” दूर रहें।
महाकवि कालिदासने स्वयं स्त्रियोंको व्याध बनाकर और हां तरह रूपक बाँधा है। उनको उक्ति का भी मज़ा चख लीजिये :—
इयं व्याधायते* वाला भूरस्याः कामुकायते । कटाक्षश्च शरायन्ते मनो मे हरिष्यायते ॥
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यह नवयौवना बाला मेरे फँसाने या मारनेके लिये व्याघ्र—शिकारी सी हो रही है। इसकी भौँहें धनुषके समान हैं; यानी यह बाला अपने भौँह रूपी धनुषसे मेरे मनको व्याकुल करती है—अपनी तिरछी नज़रोंसे मुझे घायल करे देती है।
बात एक ही है, स्त्रीके सामने जाने, उसे घूरकर देखने और उसकी नज़र-से-नज़र मिलानेसे ही पुरुष मारा जाता है। जो स्त्रीसे दूर रहें अथवा उसे देखकर नीची नज़र कर लें, उससे आँखें न मिलावे, वे बेशक उसके जाल या बाणोंसे बच सकते हैं। जिन्हें अपने कल्याणको इच्छा हो, वे स्त्रियोंको छायाके भी पास न जायँ। उनसे दूर रहनेसे पुरुषको इस लोकमें सुख-सम्पत्ति और मरने पर सद्गति मिलेगी।
दोहा ।
काम-मील भव-सिन्धुमें, बंसी-नारी डार ।
मीन-नरनको गहि पचत, प्रेम-श्रियोंको धार ॥८४॥
84. The world is like the ocean and Kamdev the fisherman. He has spread the net in the form of woman and catches and burns, in the fire of love, those who are greedy enough to taste the bait in the form of her lips.
—*—
कामिनीकायकान्तारे कुचपर्वतदुर्गमे ।
मा सञ्चर मनः पान्यं तत्वास्ते स्मरतस्करः ॥८४॥
( २६७ )
हे मन-रूपी पथिक ! कुच-रूपी पर्वतोंमें होकर, दुर्गम कामिनी के शरीर रूपी बनमें न जाना , क्योंकि वहाँ कामदेव-रूपी तस्कर रहता है ॥८५॥
खुलासा—बन और पर्वतोंमें अक्सर तस्कर या चोर बैठे रहते हैं, इसलिये बुद्धिमान लोग वैसे बन-पर्वतोंमें नहीं जाते ; क्योंकि वहाँ जानेसे धन और प्राणोंके नाशका ख़तरा रहता है । स्त्री-रूपी बनमें भी कुच-रूपी पहाड़ हैं और उनके बीचमें कामदेव-तस्कर छिपा रहता है । जो मृदु भ्रूंकर भी स्त्री-रूपी बनमें जाता है, उसके धन और प्राण ख़तरेंमें पड़ जाते हैं । सारांश यह कि, स्त्रीसे प्रेम करनेवालेकी धन-दौलत, इज्जत-आबरू और प्राण सभी ख़तरेंमें रहते हैं । इसलिये धीमानोंको स्त्रीसे सदा दूर रहना चाहिये ।
कुण्डलिया ।
एरे मन मेरे पथिक ! तू न जाहु इहि ओर । तरुणी तन-श्वन सघनमें, कुच-पर्वत वर जोर । कुच-पर्वत वर जोर, चोर एक तहीं बसत हैं । करमें लिये कमान, वाण पाँचों बरसत हैं । लूट लेत सब स्राज, पकर कर राखत चंरे । मृदु नैन झरू कान, मुलान्यों तू कित एरे ? ॥८५॥
( ३६८ )
सार—अपनी कुशल चाहो, तो स्त्रियोंसे दूर रहो ।
85. O my traveller-like mind, do not venture to enjoy the body of woman which is like a dense forest, very difficult to pass through, on account of big breasts which are like mountains and where dwells the thief Kamdev (Cupid)
—*
व्यादीर्घेण चलेन वक्रगतिना तेजस्विना भोगिना
नीलाञ्जयुतिनाऽहिना वरमहो दृष्टो न तच्चक्षुषा ॥
दृष्टे सन्ति चिकित्सका दिशिदिशि पायेण धर्मार्थिनो
मुग्धाच्चीत्तण्वीचिन्तस्य न हि मे वैयोन चान्प्यौषधम् ॥८६॥
बड़े लम्बे, तेज चलनेवाले, टेढ़ी चालवाले, भयंकर फण-धारी काले से काटा जाना भला ; पर अत्यन्त विशाल, चञ्चल, टेढ़ी चाल वाले, तेजस्वी और नीलकमलकी कान्तिवाले कामनीके नेत्रोंसे डसा जाना भला नहीं ; क्योंकि सपके काटे हुए को बचाने वाले धर्मार्थां मनुष्य सर्वत्र मिलते हैं ; पर सुनयनाकी इष्टिसे काटे हुएकी न कोई दवा है न वैय ॥८६॥
खुलासा—साँपके काटेको आराम करने वाले प्रायः सर्वत्र मिलते हैं । वे लोग बिना कुछ लिये साँपके काटे आदमीका इलाज करते और सुनते ही नङ्गे पैरों दौड़े चले आते हैं । उनके
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सिवा साँपके काटेकी दवा भी जहाँ-तहाँ विकती हैं। जङ्गलोंमें जड़ी-बूटियाँ भी पाई जाती हैं। इसलिये साँपके काटे हुए आदमीके बचनेकी उम्मीद रहती है; पर स्त्रीके नेत्रों द्वारा काटे हुए आदमीका इलाज करनेवाले और उसकी दवा—दोनों ही नहीं मिलते; इसलिये स्त्रीके काटे हुएका बचना कठिन हो जाता है। अतः प्राणरक्षा चाहने वालोंको स्त्रीके नेत्रोंसे सदा दूर रहना चाहिये, जिससे कि वे काट न सकें।
छप्पय ।
महा भयंकर चपल वक्रगति, अरु फण्णुषारी ।
डसे कालिया नाग, नहीं कछु विपता भारी ।
कोरे चिकित्सा वैद्य, धर्म-हित देयँ जिवाई ।
ये नहिं कोउ वैद्य, चिकित्सा और उपाई ।
जेहि डसत मुजेंगिनि-लिय चपल, करि कटाक्ष सो नहिं जियत । यह जानि विदुषजन जगत्में, विषय रूप विष किमि पियत ? ॥८६॥
सार—स्त्री-सर्पके काटेका इलाज नहीं है।
86. It is better to be bitten by a snake long, restless, crooked, bright fanged and colored like blue lotus than to be pierced by the oblique glances of a woman. For there are many virtuous men in every country to cure those that are bitten by snakes but there is neither a physician nor any medicine to cure those who have been glanced for a short while through the eyes of a good-looking woman.
—ॐ—
२४
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इह हि मधुरगीतं नृत्यमेतद्वसोऽयं स्फुरति परिमलोऽसौ स्पशं एष स्तनानाम् ॥ इति हतपरमार्थैरिन्द्रियैर्भ्राम्यमाणो द्वाहितकरणद्वैतैः पञ्चभिर्वैचित्रतोऽसि ॥८७॥
यह कैसा मधुर गाना है, यह कैसा उत्तम नाच है, इस पदार्थका स्वाद कैसा अच्छा है, यह सुगन्ध कैसी मनोहर है, इन स्तनोत्तम छूनेसे कैसा मजा आता है ! हे मनुष्य ! तू इन पाँच विषयोंमें भ्रमता हुआ—परमार्थ-नाशिनी नरकादिकी साधनभूत पाँचों इन्द्रियोंसे—ठगा गया है ॥८७॥
खुलासा—कान निरन्तर गाना सुनना चाहते हैं, नाक अतर फुलेल और फूल प्रभृति चाहती है, चमड़ा सुन्दरी थोड़शी बालाके कठोर कुचोंको मर्दन करना चाहता है और रसना—जीभ ज्वट-मीठे पदार्थोंका स्वाद लेना चाहती है। कान, नेत्र, नाक, त्वचा और जीभ—इन पाँचों इन्द्रियोंका स्वभाव अपने-अपने विषय—शब्द, रूप, गन्ध, स्पर्श और रसको ओर जानेका है। बस ; ये पाँचों इन्द्रियाँ पुरुषको अपने-अपने विषयोंमें फँसा कर बेकाम कर देती हैं। इनमेंसे एक-एक विषय भी मनुष्यका सर्वनाश कर सकता है। अगर ये पाँचों हों, तब तो कहना ही क्या ? सर्वनाशको पञ्चाव मेलको तरह अत्यन्त शीघ्रतासे पास आया समझिये। सुनिये, एक-एक विषयसे ही प्राणीका सर्वनाश किस तरह हो जाता है :—
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घास और दूब खानेवाला हिरन, बहुत दूर होने पर भी, शिकारीके गीत पर मोहित होकर, प्राण गँवा देता है; यानी एक "कान" नामक इन्द्रियके वश होकर मारा जाता है। अगर हिरनकी श्रवण-इन्द्रिय—कानको शब्द या गाना सुनने का चसका न हो; तो वह क्यों शिकारीके जालमें फँसकर प्राण-नाश करावे ?
पर्वतके शिखरके समान आकारवाला और खेलमें ही वृक्षों को उखाड़ फेंकनेवाला महाबलवान हाथी, केवल हन्सीकी भोग-लालसासे, शिकारियोंके घेरेंमें आकर बँध जाता है ; यानी एक लिङ्ग-इन्द्रियके वशीभूत होनेसे, अपनी आज़ादी खोकर, कैद हो जाता है।
पतङ्ग दीपक की रमणीय शिक्षाके रूप पर मुग्ध होकर, उसे आलिङ्गन करनेको, उसके ऊपर बारम्बार गिरता और अन्त में जलबल कर खाक हो जाता है। पतङ्ग केवल एक नेत्र-इन्द्रियके वशीभूत होकर अपने प्राण गँवाता है।
अगाध जलमें डूबी हुई मछली, चारोंके लोमसे, कँटियोंमें सुँह देकर अपने प्राण गँवाती है ; यानी एक जिह्वा—जीम-इन्द्रियके वशीभूत होकर, मछली अपने प्राण गँवाती है।
भौरा कमलको कतर सकता है और अपने पङ्कसे उड़ भी सकता है ; किन्तु वह सुन्दर मनभावन गन्धके ठोमसे, कमलमें बन्द होकर, अपने प्राण गँवा बैठता है ; यानी अपनी नाक—इन्द्रियके वश होकर, भौरा अपने प्राण गँवा देता है।