शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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घास और दूब खानेवाला हिरन, बहुत दूर होने पर भी, शिकारीके गीत पर मोहित होकर, प्राण गँवा देता है; यानी एक "कान" नामक इन्द्रियके वश होकर मारा जाता है। अगर हिरनकी श्रवण-इन्द्रिय—कानको शब्द या गाना सुनने का चसका न हो; तो वह क्यों शिकारीके जालमें फँसकर प्राण-नाश करावे ?
पर्वतके शिखरके समान आकारवाला और खेलमें ही वृक्षों को उखाड़ फेंकनेवाला महाबलवान हाथी, केवल हन्सीकी भोग-लालसासे, शिकारियोंके घेरेंमें आकर बँध जाता है ; यानी एक लिङ्ग-इन्द्रियके वशीभूत होनेसे, अपनी आज़ादी खोकर, कैद हो जाता है।
पतङ्ग दीपक की रमणीय शिक्षाके रूप पर मुग्ध होकर, उसे आलिङ्गन करनेको, उसके ऊपर बारम्बार गिरता और अन्त में जलबल कर खाक हो जाता है। पतङ्ग केवल एक नेत्र-इन्द्रियके वशीभूत होकर अपने प्राण गँवाता है।
अगाध जलमें डूबी हुई मछली, चारोंके लोमसे, कँटियोंमें सुँह देकर अपने प्राण गँवाती है ; यानी एक जिह्वा—जीम-इन्द्रियके वशीभूत होकर, मछली अपने प्राण गँवाती है।
भौरा कमलको कतर सकता है और अपने पङ्कसे उड़ भी सकता है ; किन्तु वह सुन्दर मनभावन गन्धके ठोमसे, कमलमें बन्द होकर, अपने प्राण गँवा बैठता है ; यानी अपनी नाक—इन्द्रियके वश होकर, भौरा अपने प्राण गँवा देता है।