भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( ३७२ )

कहा ह :—

कुर्गमांतंगपतंगभुंगमीनाः इताः पञ्चभिरैव पञ्च ।

एकः प्रमादी स कथं न हन्यते यः सेवते पञ्चभिरैव पञ्च ॥

जबकि हिरन, हाथी, पतङ्ग, भौरा और मछली—ये पाँचों एक-एक विषयके प्राणी होते हुए, विषयोंमें फँस कर, मौतके निवाले होते हैं ; तब मनुष्य जोकि रूप, रस, गन्ध, शब्द और स्पर्श—पाँचों विषयोंके फेरमें फँसा रहता है, कैसे बेमौत न मरता होगा ? संसारमें बन्धन भी बहुत होते हैं, पर प्रेम-रूपा रस्सीका बन्धन सबसे बुरा है । कड़ी-से-कड़ी बाँसकी गाँठको काट सकनेवाला भौरा, कमलके फूलमें बन्द होकर, उसकी नर्म पाशको नहीं काट सकता और उसके भीतर बैठा हुआ अपने मनमें यह विचारता है—

रात्रिर्गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातं

भास्वानुदेष्यति हसिष्यतिपद्मजालं ।

इत्थं विचिन्तयति कोशगते द्विरेफे

हाहन्त-हन्त नलिनीगज उज्जहार ॥

जब रातका अन्त होगा और सवेरा होगा ; तब सूर्य भगवान् उदय होंगे और कमल खिलेगा, उस समय मैं इस कमलके बन्धनसे निकल कर इधर-उधर घूमूँगा और दूसरे फूलोंका रस पान करूँगा—भौरोंके ऐसा विचार करते-करते ही, अचानक एक जड़ली हाथी तालाबके किनारे आता है और तालाबमें घुस

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