भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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भौर-समेत कमलके वृक्षको खा जाता है। बेचारे भौरके विचार उसके मनमें ही रह जाते हैं।

अब पाठक अच्छी तरह समझ गये होंगे कि, एक-एक इन्द्रियके वश होकर ही प्राणी किस तरह मारे जाते हैं; पर जो प्राणी अपनी पाँचों इन्द्रियोंके वशीभूत रहते होंगे, उनकी क्या गति होती होगी। जो मनुष्य मधुर गान सुनते होंगे, सुन्दरी वाराङ्गनाओंका नाच देखते होंगे, तरह-तरहके खादिर भोजन करते होंगे, उत्समोत्सम इत्र, फुलेल, सेण्ट, ओस्ट्रेकलन प्रवृत्ति सूर्यवते होंगे और कठोर कुर्बोंवाली सुन्दरी तरुणी छियों को छातीसे लगाते होंगे—वे क्या सर्वनाशसे बच सकेंगे?

यह जीवात्मा रूपी भौरा भी, कमलके भौरकी तरह, संसार रूपी तालाब और शरीर रूपी कमलमें बैठ डूबा, पञ्चेन्द्रियोंका सुख लूटता हुआ, उत्समोत्सम प्रत्यय पद और महात्माओंके उपदेश सुनकर विचार किया करता है कि, कलसे मैं ईश्वर-भजन करूँगा, परसों या अमुक दिनसे मैं अमुक दान-पुण्य करूँगा। जीवात्मा यह विचार करता ही रहता है और काल-रूपी हाथों अचानक आकर इसे अपने मुखमें धर कर खा जाता है। इस तरह इसके सारे विचार धरे-के-धरे ही रह जाते हैं। इसलिये मनुष्यको अपनी इन्द्रियाँ अपने वशमें करनी चाहिये।

“आँख-नाक प्रभृति पाँचों ज्ञानेन्द्रियों और हाथ, पाँव, गुदा, लिङ्ग और मुख—पाँचों कर्मन्द्रियोंको चलानेवाला एक“मन” है। ‘मन’ जिधर चाहता है, ये पाँचों इन्द्रियाँ उधर ही जाती हैं,