शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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इसलिये 'मन' दसों इन्द्रियोंका सञ्चालन करता है ! अब जो प्राणी दुःख और क्लेशोंसे बचना चाहे', जो जगत्को अपने वशमें करना चाहें, जो परमात्मा से मिलना चाहें अथवा जो परमपूज्य मोक्ष चाहें, उनका पहला काम—अपने 'मन और इन्द्रियों'को पूर्णरूपसे अपने वशमें करना है । पर मन बड़ा चञ्चल और तेज चलने वाला है । इसकी चाल हवा और बिजलीकी चमक से भी तेज है । इसको वश करना सहज नहीं, क्योंकि इसका स्वप्नान्ही इन्द्रियोंको विषयोंकी ओर झुकाना है और विषयोंमें फँसे हुए मनुष्यका कहीं ठिकाना नहीं । मनको वश करना कठिन होने पर भी, अभ्याससे वह सहजमें वश हो जाता है । अंगरेज़ीमें एक कहावत है—“Where is a will, there is a way” जहाँ इच्छा होता है, वहाँ राह भी हो जाती है । यदि मनुष्य इस बात पर कटिबद्ध हो जाय, मनको वशमें करनेके लिए कमर कस ले, तो मन अवश्य वशमें हो जायगा । मन वशमें हुआ और मनुष्य देवता हुआ । फिर उसे दुःख क्या ?
मनके सम्बन्धमें गिरिधर कविकी कुण्डलियाँ पाठकोंको सुनाते हैं :—
कुण्डलिया ।
हे मन ! शब्द स्पर्श जो, रूप पुत्रः रस गन्ध । सर्व दुःखोंका बीज यह, तू नहीं सुमझत श्रम्य ॥