भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

पृष्ठ 450, कुल 544 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 450

( ३७५ )

तू नहीं समझत अन्य, सदा इन्हीं को चाहे । अपनी हथी आप, आपने तन को दाहे ॥ कह गिरधर कविराय, जो प्रत्यक आनन्द धन रे । तिसहि मांहि रह लीन, सुखी तब होवे मन रे ॥

औरमी :—

कुरडलिया ।

रे मन ! भौतिक वर्ग में, तू महन्त परधान । तेरे पाछे हैं सबै, देह बुद्धि इन्द्रिय आन । देह बुद्धि इन्द्रिय प्राण, इन्होंमें तू है नायक । किया तेरे आधीन, मानसी-बाचिक-कायिक । कह गिरधर कविराय, होवे तबहीं धनधन रे । जब निर्वाकार हो रहे, सर्वथा इक रस मन रे ॥

व्यप्यय ।

काम निरन्तर गान-तान, सुनिबोही चाहत । लोचन चाहत रूप, रैन-दिन रहत सराहत । नासा अतर-सुगन्ध, चहत फूलन की माला । त्वचा चहत सुख-सेज, संग कोमल-तन बाला । रसनाहू चाहत रहत, नित खाटे मोटे चरपरे । इन पंचन या प्रपञ्च सौं, भूपनको भिन्नू करे ॥८७॥