भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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सार—अगर मनुष्य नित्य सुख चाहे, तो इन्द्रियोंको विषयोंको और न जाने दे, उन्हें अपने वशमें करे ।

87, O men, you have been made to run about cheated by these five senses, which obstruct the way for the other world and are skilful in doing evils. ( Ear ) :—How sweet is this song ; ( Eye ) how beautiful is this dance ; ( Taste ) how tasteful is this ; ( Smell ) how sweet is this scent, and ( Touch ) how very pleasing are these breasts to touch.

—*—

न गम्यो मन्त्राणां न च भवति भैषज्यविषयो न चापि पञ्चसं व्रजति विविधैः शान्तिकशतैः ॥

अमावेशादङ्गो किमपि विदुःशङ्गमसम्

स्मरोऽपस्मारोऽयं भ्रमयति दृशं वृणीयति च ॥८८॥

जब कामदेव रूपी अपस्मार—मुगी—रोगका, भ्रमके आवेश से, दौरा होता है, तब शरीरमें असह्य वेदना होती है, शरीर दूखता है, मन घूमता है और आँखें चक्कर खाती हैं। यह रोग मन्त्र, औषधि, नाना प्रकारके शान्ति-कर्म और पूजा-पाठ किसीसे भी नाश नहीं होता।

खुलासा—अपस्मार या मुगी रोग शोक-चिन्ता प्रभृतिसे होता है। उसके दौरेके समय मनुष्यका ज्ञान नष्ट हो जाता है,

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