शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
( ३७६ )
सार—अगर मनुष्य नित्य सुख चाहे, तो इन्द्रियोंको विषयोंको और न जाने दे, उन्हें अपने वशमें करे ।
87, O men, you have been made to run about cheated by these five senses, which obstruct the way for the other world and are skilful in doing evils. ( Ear ) :—How sweet is this song ; ( Eye ) how beautiful is this dance ; ( Taste ) how tasteful is this ; ( Smell ) how sweet is this scent, and ( Touch ) how very pleasing are these breasts to touch.
—*—
न गम्यो मन्त्राणां न च भवति भैषज्यविषयो न चापि पञ्चसं व्रजति विविधैः शान्तिकशतैः ॥
अमावेशादङ्गो किमपि विदुःशङ्गमसम्
स्मरोऽपस्मारोऽयं भ्रमयति दृशं वृणीयति च ॥८८॥
जब कामदेव रूपी अपस्मार—मुगी—रोगका, भ्रमके आवेश से, दौरा होता है, तब शरीरमें असह्य वेदना होती है, शरीर दूखता है, मन घूमता है और आँखें चक्कर खाती हैं। यह रोग मन्त्र, औषधि, नाना प्रकारके शान्ति-कर्म और पूजा-पाठ किसीसे भी नाश नहीं होता।
खुलासा—अपस्मार या मुगी रोग शोक-चिन्ता प्रभृतिसे होता है। उसके दौरेके समय मनुष्यका ज्ञान नष्ट हो जाता है,
( २७७ )
नेत्र टेढ़े तिरछे घूमने लगते हैं, हाथ-पाँवोंका सत्त्व निकल जाता है और स्मरणशक्ति नष्ट हो जाती है। कामदेव रूपी अपस्मार रोगमें भी प्रायः ऐसे ही लक्षण होते हैं। कामार्त्त रोगीका मन और नेत्र घूमने लगते हैं। होश-हवास हवा हो जाते हैं। मुँहसे कहना कुछ वाहता है और निकलता कुछ है। साधारण अपस्मार और कामदेवके अपस्मारमें एक बड़ा भेद है। वह यह कि, अपस्मार तो घृत, ब्राह्मी घृत, कृष्माण्ड घृत, खलप पञ्चगव्य घृत और महापञ्चगव्य घृत तथा त्रिफला तेल एवं भूतोंके योगमें जो भाङ्ग-फूँक मन्त्र-जन्त्र किये जाते हैं, उन से आराम हो जाता है; पर कामदेव रूपी अपस्मार की कोई भी औषधि, आज तक, किसीने नहीं निकाली; इसलिये भगवान् न करे जो किसीको यह रोग हो। जिन्हें इस भयङ्कर प्राणनाशक और परमार्थ-नाशक रोगसे बचना हो, वे कामिनियों के चञ्चल नेत्रोंसे दूर रहें, क्योंकि स्त्रियों की तेज नज़रोंसे बचने वालों को यह रोग नहीं होता। यदि कोई उनकी चपेट में आ जाय, उनका विष उस पर चढ़ जाय, तो विषस्य विषमोषधम् अर्थात् विष की औषधि विष है। उनका विष वे ही उतार सकते हैं। महाकवि कालिदासने अपने “श्रृङ्गार तिलक” में कहा भी है:—
दृष्टि देहि पुनर्वाले ! कमलामृतलोचने ! श्रूयते हि पुरालोके विषस्य विषमोषधम् ॥
( ३७८ )
हे बाळे ! हे कमलनयनी ! मेरी ओर फिर अपनी दृष्टि फँक, क्योंकि सुनते हैं कि विषकी दवा विष है। मुझ पर तेरा जहर चढ़ा है, अगर तू ही उतारे तो वह उतर सकता है।
किसीने किसी इश्कके मरीजके इलाजके लिये किसी हकीमको बुलाया। हकीम साहब नज़्ज टोडलने लगे, तो किसी बुद्धिमानने कहा :—
जूँ पञ्जशाखा तू न जला उँगलियाँ तबीब ।
रख-रखके नञ्ज आशिके तफ़्ता जिगर पै हाथ ॥जौका॥
हकीम साहब ! क्यों अपने हाथको पञ्ज शाखेकी तरह दिल-जले आशिकूकी नञ्ज पर रख कर बुथा जलाते हो ? इश्क का मरीज आप की दवासे आराम न होगा।
दोहा ।
मन्त दवा अरु आपसों, वेदन मिटै न वैद ।
कामबान सों भ्रमत मन, कैसे मिटहै कैद ? ॥८८॥
सोर—साधारण अपस्मार या मृगीरोग का इलाज है, पर कामके अपस्मारका इलाज नहीं है।
88. This Kamdev ( Cupid ) like Epilepsy gives much pain due to senselessness, overcasts the mind and rolls the eyes. Neither any charm nor any medicine has any effect on those attacked by it, nor is it cured by various pacifying worships,
—*—
( ३७१ )
जात्यन्थाय च दुर्भुलाय च जराजीर्णार्षिलांगाय च ग्रामीणाय च दुष्कुलाय च गलकुष्ठाभिन्नाय च ॥
यच्छन्तीषु मनोहरं निजवपुर्लक्ष्मीलवश्रद्धया
पयस्यन्तीषु विवेककल्पलतिकाशन्तीषु रज्येत कः ॥८६॥
कुरुप, बुढ़ापे से शिथिल, गँवार, नीच और गलित कुष्टीको, थोड़ेसे धनकी आशासे, जो अपना सुन्दर शरीर सौंप देती है और जो विवेक रूपी कल्पलता के लिये छुरीके समान हैं, उस वेश्यासे कौन विद्वान् रमण करना चाहैगा ?
वेश्या एकमात्र धनकी दामी है ।
वेश्या पैसों को प्यार करती है, पुरुषको नहीं । उसे जो पैसा देता, वह उसीकी हो जाती है ; चाहे वह भट्टी, चमार या चाण्डाल हो क्यों न हो । जातिहीन, कुलहीन, जन्मान्ध, कुरुप, बूढ़ा, दुर्बल, काना और गलित कुष्टी भी अगर धनी हो और उसे धन है, तो वेश्या—बिना किसी तरह के विचार और प्रशोपेशके—उसके नीचे अपना सोने सा शरीर बिछा देती है । वेश्या को जीवन और बूढ़े, सूबसूरत और बदसूरत, काने और अन्धे, लूढ़े और लँगड़े, निर्बल और सबल, चोर और ठग, ज्वारी और शराबी, सदाचारी और कदाचारी, हिन्दू और मुसलमान सब
( ३८० )
समान हैं। उस को न किसीसे मुहब्बत है और न किसीसे परहेज। वह धन देने वाले को चाहती है और न देने वाले से परहेज करती है।
किसी कविने कहा है और बिल्कुल ठीक कहा है:—
वितेन वेत्ति वेश्या स्मरसदृशं कुष्ठिनं जराजीर्णम् ।
वित्तं विनापि वेत्ति स्मरसदृशं कुष्ठिनं जराजीर्णम् ॥
पेस्ट्रेटाले कोढ़ी और जराजीर्ण पुरुष को वेश्या कामदेवके समान सुन्दर समझनी है ; और बिना पैसे वाले धनहीन को, चाहे वह कामदेव के समान सुन्दर ही क्यों न हो, कोढ़ी और बुढ़ापेसे जीर्ण समझती है।
वेश्या जगत की जूठन, गन्दगी का पिटारा और नरक-कूप है। कौन बुद्धिमान ऐसी वेश्या के नर्म-नर्म ओठों को चुमना और उसे आलिङ्गन करना पसन्द करेगा ?
वेश्यामें और स्त्रियोंसे अधिक मोहन-शक्ति है।
यों तो संसार में जितनी स्त्रियाँ हैं, सभी पुरुषके चित्तको हरने वाली हैं ; पर साधारण स्त्रियोंकी अपेक्षा वेश्यामें चञ्चलता बहुत ज़ियादा होती है, इसी से उसमें पुरुष को मोहित कर लेने की शक्ति भी उनसे हज़ार गुणी ज़ियादा होती है। वेश्यायें अपने गाने-बजाने का जाल बिछाकर और रूपका
( ३८१ )
जुगा दिखाकर नौजवान पक्षियोंको, सहजमें, अपने फन्देमें फँसा लेती है। वेश्याओंकी लपक-भपक, चटक-मटक, नाजो-अदा और हाव-भाव तथा नखरों पर उठती जवानी के नातजुरबेकार नौजवान फिदा होकर, शीघ्र ही फँस जाते और इनके गुलाम हो जाते हैं। जो इनके दास या शिष्य हो जाते हैं, वे फिर किसीके नहीं रहते। उन्हें अपनी घर-गृहस्थी, अपने पूज्यपाद माता-पिता और अर्द्धाङ्गि कहलाने वाली स्त्री तक विषवत् बुरे लगते हैं।
साधारण नवयुवकोंको पागल बनाना, तो वेश्याओंके बाँये हाथ का खेल है। जब इन्होंने पकान्त बनमें रहनेवाले, वृक्षों के पत्तों और जल पर गुजारा करनेवाले महान् तपस्वी श्रृङ्गी और मरीचि तकको अपना चेला बनाकर छोड़ा, उनको अपने रूप-जालमें फँसाकर, उनके कठिन परिश्रम से किये हुए तपको क्षणभर में नष्ट कर दिया ; तब इनके लिये नादान नौजवानों को फन्देमें फँसाना कितनी बड़ी बात है ? ऐसी शिकार मारनेमें तो इन्हें जरा भी कठिनाई नहीं होती।
ये, दिव्य मणिधारी सर्प की तरह, देखने में बड़ी मनोहर होती हैं। ये अपनी रूपच्छटा से पुरुषों के मनों को मोह लेतीं, मधुर-मधुर बातों से चित्तोंको चुरा लेतीं तथा हाव-भाव और नीजो-अदासे हिये को हर लेती हैं। योद्धाओं के अग्नि-बाणोंसे चाहे रक्षा हो जाय, पर इन के नयनबाणोंसे किसी का निस्तार नहीं। इन के-बन्धल नेत्र प्रायः सभी के हृदयों में क्षोभ
( ३८२ )
करते हैं। किसी विरली ही सती का सपूत इनके नेत्र-बाणों से बचे तो बच सकता है।
वेश्या सन्नी राजसी है ।
वेश्यायें पुरुष का रक्त-मांस खा जानेवाली सन्नी डायन हैं ; क्योंकि जो काम डायनोंके सुने जाते हैं, वेही काम ये करती हैं। डायनें जिसे नज़र-भरकर देख लेती हैं, वह गल-गल कर मरता है और वे उसका कलेजा निकाल कर खा जाती हैं। वेश्यायें भी जिस पर अपने कटाक्षबाण चला देती हैं, वह पगला हो जाता है और फिर वे उसका कलेजा निकाल खाती हैं। वेश्यायें लड़के और नौजवान सब को खा जाती हैं ; खासकर धनियों की तो चटनी ही कर जाती हैं। इन से न राजा की रक्षा है और न प्रजा की। इनकी भूपेट में जो आ जाता है, ये उसी का करम-कल्याण कर देती हैं। ये देखते ही पुरुषों को घायल कर देती हैं और पीछे अपनी नज़र से उनके प्राण खींच लेती हैं। सर्प का डसा हुआ आदमी बच भी सकता है, पर इन डायनोंका डसा हुआ नहीं बचता। सर्पोंके तो सुँहमें विष रहता है, पर इन के समस्त शरीरमें विष रहता है। सर्प मनुष्य के पास आकर डसता है ; पर इन का विष तो दूरसे ही, इनके देखनेमात्र से ही, चढ़ जाता है। इनके अङ्ग-प्रत्यङ्ग और एक-एक बाल तकमें जहर भरा रहता है, इसीसे इनका कोई
( ३८३ )
अज्ञ भी, यदि पुरुष की नज़रोंमें आ जाता है, तो उस पर बरी तरहसे ज़हर बढ़ने लगता है। ज़हर बढ़नेसे फिर पुरुषकी ख़ेर नहीं। किसीने कहा है :—
धर्म-कर्म-धन-भक्षिणी, सन्तति-खावनहार।
वेश्या है अति राक्षसी, बुधजन कहत पुकार ॥
और भी :—
दर्शनात् हस्ते चित्तं, स्पर्शनात् हस्ते बलम् ।
मैथुनात् हस्ते वीर्यं, वेश्या प्रत्यक्ष-राक्षसी ॥
वेश्या साक्षात् राक्षसी है, क्योंकि वह देखने से चित्त को, छूने से बलको और मैथुन से वीर्य को हरती है।
वेश्याओंके कारण कुल-बधुएँ भ्रष्ट होती हैं।
— ✻ ✻ ✻ —
वेश्याओंकी बजह से श्रेष्ठ कुलवतीऔर पतिपरायणा अबलायें नाना प्रकारके कष्ट भोगती हैं। वेश्यामक न अपने सहधर्म-णियोंके पास आते, न उनसे बोलते और न उनका आदर-सम्मान करते हैं। पतिव्रता स्त्रियोंको बानेको अन्न और तन दाँकतेको कपड़ा भी नसीब नहीं होता ; पर वेश्याओंको, जो अपने पतियोंको तज, सैसुरकुल एवं पितृकुलको बद्नाम कर, वेश्यावृत्ति करती हैं, सब तरहके सुख मिलते हैं। पतिपरायणा
( ३८४ )
नारियोंको मरनेके लिये जहर तक नहीं मिलता, पर वेश्याओं को हज़ारों-लाखोंके जेवर मिलते हैं। वेश्यामहलोंकी सती स्त्रियाँ मिहन्त-मजदूरी करके पेट भरती हैं। अनेक कुलङ्कनायें खरबे कात-कात कर और आटा पीस-पीस कर अपनी शिशु-सन्तानों को पालती हैं। इस तरह नौसमभ लोग बड़ा अन्याय करते हैं। उनके अन्याय-आचरणके फल-स्वरूप इन दुष्टा वेश्याओंकी संख्या दिनों-दिन बढ़ती है ; क्योंकि जब धर्म-मार्ग पर चलनेसे भी कुलबधुओंको अन्त-वस्त्र तक नहीं मिलते, पतिका सुख नसीब नहीं होता ; तब वे अन्तसकी अग्नि शान्त न होने और नाना प्रकारके दुःख पानेसे दुःखित हो, अपना धर्मत्याग, अधर्म-मार्गका अवलम्बन करतीं और वेश्या हो जाती हैं। इसमें उनका अपराध नहीं ; क्योंकि जैसी इन्द्रियाँ मर्दोंके होती हैं, वैसी ही इन्द्रियाँ स्त्रियोंके भी होती हैं। काम मर्दोंको सताता है, तो स्त्रियोंको भी सताता है। जिस चीज़की क्वाहिश पुरुषोंको होती है, उसीकी स्त्रियोंको भी होती है। जो पुरुष आप खाते, रण्डियोंको खिलाते, आप मौज करते, वेश्याओंको मौज कराते ; किन्तु घरकी स्त्रियोंकी सुध भी नहीं लेते, उनकी स्त्रियाँ उनका सुँह काला करतीं और—उनके जीतेजी हो, उनकी बदनामी कराती हैं। वह जैसा करते हैं, वैसा फल भोगते हैं ; अतः अपना सुख चाहनेवाले समझदारोंको आगा-पीछा सोचकर, वेश्याओंसे सदा दूर रहना चाहिये।
( ३८५ )
वेश्याभक्तोंकी दुर्दशा ।
नासमभ नादान लोग जब वेश्याओंके कटाक्ष-वाणोंसे घायल होते हैं, तब रात-दिन अष्ट पहर चौंसठ घड़ी उन्हें वही वह दीखती हैं । वे उन्हें स्वर्गीय देवी समभ, उनकी हर तरह से स्तुति, पूजा और उपासना करते हैं । कोई कहता है—
दिलसे मिटना, तेरी अंगुरत हिनाईका ख्याल ।
हो गया गोशतसे, नाखुनका जुदा हो जाना ॥
कोई कहता है—
दिल वह क्या, जिसको नहीं तेरी तमन्नाये विसाल ।
चश्म वह क्या, जिसको तेरे दीदकी हसरत नहीं ॥
इस तरह उनके उपासक और भक्त उनको स्तुति किया करते हैं । उनकी ज़बानसे बात निकलती नहीं कि, उनके भक्त उसे फौन ही पूरी करते हैं । उनकी फ़रमायशें पूरी करनेके लिये, उनके सेवक अपनी ज़मीन-जायदाद गिरवी रख देते हैं, अपनी घरकी खीका जेवर तक उतार कर उनके हवाले कर देते हैं । इतनेपर भी, यदि कोई बुटि या ग़लती हो जाती है, तो वेश्यायें सख्त नाराज़ी ज़ाहिर करती हैं । उनकी नाराज़ी, वेश्याभक्तोंके लिये, ख़ुदके तीसरे नेत्र खुलने या महाप्रलय होनेके समान होती है । वे घबरा कर उनके चरणोंमें लोटते और कदमोंमें नाक रगड़-रगड़ कर माफ़ी माँधते हैं ।
२५
( ३८६ )
जब वेश्याये' देखती हैं कि, हमारे उपासकोंके पास धन नहीं रहा, घर-घूरा सब बिक चुका ; तब वे उन्हें जृतियोंसे पिटवाकर अपने घरोंसे निकलवा देती हैं । पर वे वेश्या, इतनी बेइज्जती और जिलुते' उठाने पर भी, उनको छोड़ना नहीं चाहते; पैरोमें गिरते हैं, अनेक तरहकी खुशामदे' करते हैं, तब उन्हें ये अपने नीचे दर्जेके सेवकोंमें रहने देती हैं । अच्छे-बच्छे खानदानी अमीरोंके लड़कोंसे घरमें भ्राड़ लगवातीं, खाना पकवातीं, पीकदान साफ करवातीं और हुक्के भरवातीं हैं । कहाँतक लिखें, वेश्या-दासोंकी अन्तमें बड़ी मिट्टी झराब होती है । भगवान् दुश्मनको भी वेश्याके फन्देमें न फँसावे । वेश्या बुरी बला है । यदि वेश्याओंकी पूरी तारीफ़ लिखी जाय, तो एक पोथा हो जाय, इसलिये हम इस विषयको यही खतम करते हैं ।
वेश्या है अवगुण भरी, सब दोषोंका सिन्धु ।
अरूप दोष वर्णन किये, लाखों सिन्धुमें विन्दु ॥
ऐसी औगुणोंकी खान, धन-धर्म नसाने वाली, अबलाओं पर अन्याय करनेवाली, कुलबधुओंको दुष्कर्मोंका पाठ पढ़ाने-वाली, बाल-हत्या, पुत्री-हत्या और गोहत्या तक करानेवाली वेश्याको जो देखते, छूते और उससे रमण करते हैं, उनको विकार है ! नाचते समय वेश्या स्वयं कहती है :—
जब पूरण पापके भाण्डे तें,
भगवन्त-कथा न सुने जिनको ॥
( ३८७ )
एक गणिका नारी बुलाय लेंहूँ,
नचवावत हैं दिनकों-रनको ॥
मृदंग क्रहे—‘धिक् है ! धिक् है !!’
मजीर कहें—‘किनको किनको ?’ ॥
तध हाय उठायके नारि कहे,
‘इनको इनको इनको हनको ॥’
वेश्याकी चालें ।
‘वेश्यायें’ अपने यारोंको रिझाने और नये-नये शिकार फँसानेके लिये, मन्दिरों, मेलों-तमाशों और तीर्थ-स्थानों तथा बाग-बगोचोंमें जातीं और नाना प्रकारके मनमोहक वस्त्राभूषण पहनती हैं । कितनीही अपने यारोंकी इच्छानुसार श्रद्धांवर करतीं और कहती हैं “व्यारे ! तुम्हारे बिना हमें क्षण-भर भी कल नहीं पड़ती । माँके मारे हमारी नहीं चलती । माँके नाराज होनेके भयसे आपसे रुपया-पैसा लेना पड़ता है; वरना हमारी इच्छा नहीं कि, आपसे कुछ ले । आप हमारे सूरज और चाँद हो, आप ही हमारे पान का चूना, बिछौनेकी चादर, हुक्के की चिलम और थूकनेकी पीकदानी हो ।” नादान लोग इन की झूठी और मक्कारीकी बातोंपर लट्ठू होकर, इनको अपनी सच्ची प्रेमिका समझ लेते हैं; पर जहाँदीदा लोग जानते हैं कि, वेश्याओं में प्रीतिका नाम भी नहीं । अगर सूर्यमण्डलमें शीतलता हो, चन्द्रमा अग्नि उगलने लगे, विन्ध्या-चल समुद्र में तेरने लगे, तो वेश्या में प्रीति हो सकती है ।
( ३८८ )
आज तक जप में सत्य, कवे में पवित्रता, सर्पमें सहनशीलता, स्त्रियोंमें काम-शान्ति, नपुंसकों में वैश्य, शराबी में तरबचिता, राजा में मैत्री और वेश्या में सतीत्व न किसीने देखा और न सुना । वेश्यागामी कामकन्दला का नाम पेश करते हैं ; पर कामकन्दला वेश्या नहीं, गणिका थी । वेश्या और गणिका में बड़ा भारी भेद है । गणिका वेश्या से बहुत अच्छी होती है । वेश्या धन के लिए प्रेम प्रकट करके विषयी पुरुषों को तूत करती है । गणिका अनेक प्रकार की विद्याएँ जानती और प्रेम-प्रतीतिको समझती है । वेश्या नीच उपायों से कामियों को ठगती है ; पर गणिका उच्च प्रीतिरीति बांध कर धन हर्ती है । वेश्या केवल धन की साधिन होती है ; पर गणिका गुण, रूप और विद्वत्ता की भी प्राहिणी होती है । लेकिन आजकल गणिका कहाँ ? जिधर देखा, वेश्या-ही-वेश्या नज़र आती हैं । सब पूछो तो न गणिका भली और न वेश्या । दोनों से ही पुरुष के रूप, धन और यौवन की क्षति है ; अतः बुद्धिमानों को दोनों से ही बचना चाहिये । भूल कर भी, इन का नाम न लेना चाहिये ।
एक राजा और वेश्याकी कहानी ।
किसी पुराने ज़माने में एक रणधीर सिंह नामका राजा राज्य करता था । वह राजा था तो बड़ा प्रतापी और बलवान,
( ३८६ )
पर कई राजाओंने मिल कर उसे हरा दिया। पराजय होते ही, वह राजधानीसे भाग गया। उसका प्रधान मंत्री गुणसिन्धु भी उसके साथ हो लिया। दोनों घूमते-घूमते एक और नगरमें पहुँचे। उस नगरमें कामिनी नामकी एक परमा सुन्दरी वेश्या रहती थी। उस वेश्याके धन-भागडार को देख कर कुवेर भी लजाता था। अपार धन होनेकी वजहसे, वह वेश्या किसी भी अमीरका आदर न करता थी। यद्यपि वह, वेश्या होनेसे, धना-कांक्षिणी और निर्धन-अपमान-कारिणी थी; तथापि उसने ब्रह्मिणी रणधीर सिंहका बड़े आदरसे आगत-स्वागत किया। अपने धन-भागडार राजाके लिए खोल दिये और भव्य भवन टिकनेके लिये बता दिये। उसकी सेवाके लिए अनेक दास-दासी नियुक्त कर दिये। अपने झूजाने को चाबियाँ राजाके हाथोंमें दे दीं और कह दिया कि, यह धन आपही का है। अपनी इच्छानुसार खर्चा कीजिये; दिलमें जरा भी संकोच न कीजिये। राजा रणधीर राज्य रहित होने पर भी, उस वेश्या का इतना सहज प्रेम देख, मन-ही-मन अत्यन्त प्रसन्न हुआ। उसे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय, विश्वासपात्री और सती समझ कर, एक दिन एकान्तमें अपने मंत्रीसे कहने लगा—“हे प्रधान! यह वेश्या बिना किसी स्वार्थके मेरे साथ इतना प्रेम रखती है। इसने अपना सर्वस्व मुझे सौंप दिया है और व्याहता स्वीसे भी अधिक आह्लाकारिणी है। यह सब देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य होता है। समझमें नहीं अरता, इस की क्या वजह है। सभी
( ३६० )
जानते हैं कि, वेश्याएँ किसीके साथ प्रीति नहीं करतीं। इनका प्रेम एकमात्र धनके साथ होता है और खूब धन पाने पर भी ये किसी की नहीं होतीं ; परन्तु यहाँ तो सब उल्टा ही दीखता है। यह सती और अविचल प्रेमवती है, इसमें मुझे जरा भी शक नहीं होता।” गुणसिन्धु अपने मालिक की आज़ादी को रणडी की बातों की धारामें बहती देख, दिल्ली करता हुआ, कहने लगा,—“राजन् ! वेश्याका विश्वास विश्वमें कौन करता है ? कागा जती नहीं होता और वेश्या सती नहीं होती। यह ज्ञात विश्वासयोग्य नहीं। यह किसीको प्यार नहीं करती। इसका एक मात्र प्यारा रुपया है। यह अपने वचनको कभी पूरा नहीं करती। यह कभी किसीसे नेह निर्वाह नहीं करती। झूठ बोलना इसका नियम और ब्रत है। इसके मनकी बात, इसके संकल्प और इसकी महत कामनाको सहजमें ही कोई जान नहीं सकता। यह आपका अत्यन्त आदर करती है। आपके साथ अटल प्रेम प्रकट करती है ; पर यह सुख क्षणिक है। मतिहीन लोग वेश्याके बारे विचारोंको न जान कर, उसकी ऊपरी बातों पर मर-मिटते हैं। वह उपरसे अमृत है, पर भीतरसे हालाहल विष है। वेश्या—आशाकी तरह, आरंभमें अतिशय आनन्ददायिनी होती है ; परन्तु अन्तमें अमित दुःखसे पददलित कर छोड़ती है। हरि और हर प्रभृति देवता भी वेश्या और मायाके सच्चे स्वरूप को नहीं जानते ; तब आदमी बेवारा किस क्षेतकी मूली है ?
( ३६१ )
राजा पर मंत्रीको उपरोक्त बातों का बड़ा असर हुआ। उनके दिलमें तरह-तरहके विचार उठने लगे। उन्होंने वेश्या की प्रीतिकी परीक्षा लेनेकी ठानी। वह एक दिन साँस चढ़ा कर मुदाँ हो गये। राजाकी अन्त्येष्टि किया करनेके लिये लोग उन्हें श्मशान पर लेगये। वेश्या भी सफेद कपड़े पहन कर, सती होनेके लिये, चिताके पास पहुँची। वह ज्योंही चितामें गिरने लगी, त्योंही राजाने चितासे उठकर उसका हाथ पकड़ लिया और कहा—“प्यारी”! सच्ची सती!.. ठहर! ठहर! मैं जिन्दा हूँ।”
उस दिनसे राजा रणधीर सिंह उस वेश्याके एकदम गलाम हो गये। उन्हें मंत्री पर बड़ा क्रोध आया। वे उसे मूर्ख समझने लगे। अब राजाके दिन फिलने और मंत्रीकी बात सच्ची होनेका समय आया। राजाने वेश्याकी अपार सम्पत्ति खर्च करके, कई लाख पैदल, पचास हजार सवार और दस हजार हाथी वगैरः अपने हाथमें कर लिये। उस सेनाको लेकर उन्होंने अपने शत्रु पर चढ़ाई की और उसे पराजित कर अपना राज्य ले लिया। वेश्या पटरानी बनाई गई। सब रानियोंसे अधिक उसका मान होने लगा।
एक रोज राजाको बहुत ही प्रसन्न देखकर वेश्याने कहा—“महाराज”! मैंने आपके साथ जो भलाई की है, उसे आप यावज्जीवन नहीं भूलेंगे। क्या आप, उसके बदलेमें, मेरी भी एक मनोकामना पूरी करेंगे?” राजाने कहा—“प्यारी! तु जो कह
( ३६२ )
में वही करनेको तैयार हूँ।” वेश्याने कहा—“महाराज ! मेरा एक प्राणाधार, परम प्यारा, नयनोंका तारा है। वह निरपराध, चोर समझा जाकर, विदर्भ नगरमें पकड़ा गया और आज तक जेलमें बन्द है। आप उसे कठिन कारागारसे छुड़ाकर, दासी को कृतार्थ कीजिये।”
वेश्याकी उपरोक्त बात सुनते ही राजाके होश-हवास जाते रहे। अकृ हवा हो गई, सन्नाटा छा गया, वे उगेसे हो गये। वे इकट्ठा वेश्याके मुँह की तरफ देखने लगे। कुम्हलाये हुए कमलके फूलकी तरह, उनका सिर नीचेको झुक गया। इस समय उन्हें मंत्रोंकी बातें याद आईं। उनके दिलमें, समुद्रकी लहरोंकी तरह, एक-पर-एक संकल्प-विकल्प उठने लगे। बड़ी देरके बाद वह बोले :—
“प्यारी ! सुख-दुःखकी साधन ! तुम्हें आज क्या हो गया है ? क्या तूने आज शराब पी ली है ? तू आज ऐसी बेहूदी बातें क्यों कर रही है ?” राजाने उसे बहुत तरहसे समझाया, पर वह अपनी बातसे जरा भी न डिगी। उसने कहा—“महाराज ! आप बहुत भोले हैं। जगत्में बिना स्वार्थके कोई भी मुहब्बत नहीं करता, जिसमें हमारा तो स्वार्थपरायण व्यवहार जगत्में प्रसिद्ध है। अगर आपको मेरे उपकारका लेशमात्र भी ध्यान है और आपके चित्तपर कृतज्ञताका जरा भी संस्कार है, तो आप मेरी इस प्रार्थनाको स्वीकार कीजिये।” लाचार, राजाने सेना भेजकर विदर्भ नगरको फतह
( ३६३ )
किया और उस वेश्याके यारको जेलसे छुड़ाकर उसके हवाले किया।
बुद्धिमानो ! वेश्यासे सदा सावधान रहो। वह तुमसे प्रेम रखती है, तुम्हें चाहती है, ऐसा कभी मत समझो। अगर ऐसा समझोगे, तो धोखा खाओगे। वेश्या यारसे बातें करती है; पर उसका मन और जगह रहता है। वेश्या अपना तन हर किसीको सौंप देती है, पर मन किसीको नहीं सौंपता। वह क्षण-क्षणमें नई-नई बातें कहता है। एक शब्द दूसरेके, मुक्तिकूल कहना, तो उसका कर्त्ताव्य है। बातोंका लौटफेर और फेरबका ढेर सदा उसके पास मौजूद रहता है। वेश्या स्कूटकी पुतली है। उसे यथायथ रूपसे कोई भां जान नहीं सकता। वेश्या पाँच तरहके यार रखती है—(१) एककी तो वह तारीफ़ हो किया करती है, (२) दूसरेका धन लूटता है, (३) तीसरेसे सेवा कराती है, (४) चौथेको अपनी रक्षाके लिये रखती है, और (५) पाँचवें की सदा मसखरी किया करती है। वेश्या किसीसे भी प्रीति नहीं करती। जो नर वेश्याके बन्धनमें फँस जाता है, उसको मुक्ति चिकालमें भी नहीं होती। उसका सत्यानाश हो जाता है। सुख-शान्ति उसमें किनारा कर जाते हैं। कुटुम्ब परिवार वाले उसे धिक्कारते हैं। वेश्यागानों इस लोक और परलोकमें अनेक तरह-बेकष्ट और क्लेश भोगता हुआ, चौरासी लक्ष योनियोंमें भ्रमता रहता है। जिस तरह माँप अपनी पुरानी कैंचलाको त्याग देता है; उसी तरह वेश्या अपने करोड़पति यारको भी निर्धन होते
( ३६४ )
ही, जूने मारकर निकाल देती है। इसलिये जिन्हें संसारमें सुख भोगना हो, वे वैश्याके नज्दीक न जावें।
किसीने क्या खूब कहा है :—
गाना न० १
रगड़ी नहीं किसी को यार, ओ घर बार लटाने वाले। तीखे नयन चलाने वाले, रगड़ी नहीं किसी को यार ॥ इनका कूठा है जंजाल, इनका खोटा है व्यवहार। इसमें नफा नहीं है यार, ओ घरबार लटाने वाले ॥ इनके नखेरे इनकी चाल, इनके चिकने-चिकने गाल। इनके लम्बे-लम्बे बाल, आकृत करने वाले ॥ रड़ी नहीं किसीको यार, ओ घर-बार लटाने वाले। इनकी उद्दबत, इनको बातोंमें मत आना ॥ इसपर दिलको मत ललचाना, इनकी उद्दबतसे घराना।
आकृत था जाय जाने वाले। रगड़ी नहीं किसी को यार। ओ घर-बार लटाने वाले ॥ जब तक पैसा तबतक रगड़ी। जबतक बिलसे तबतक मगड़ी। वह तो खा-खा हुई मुछगड़ी। तुम पर आने लगे तमाले। जब से रुक गई घरकी मोरी। माँगो भीख करो या चोरी। अब तो हवा जेल की खा ले। रगड़ी नहीं किसी की यार। ओ घर-बार लटाने वाले ॥
( ३६५ )
गाना न० २
पहले तो घरमें दाम बिछाती हैं रघिइयाँ ।
वे-दाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रघिइयाँ ॥
करके सिंगार शामको, छा बैठीं बाम पर ।
करती हैं फिर इधारा, वह मक्कार वेखतर ॥
देखा कि मालदार, कोई भ्राता है इधर ।
फौन किया सलाम, फिर उसने मुँकाके सर ॥
किस ढबसे तुम्हें चालमें, लाती हैं रघिइयाँ ।
वे-दाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रघिइयाँ ॥
लेकर सलाम हो गये, गेंडासे फूलकर ।
कोठे पै उसके चढ़ गये, सोचा न कुछ मगर ।
तकिया लगाके बैठ गये, सीना तामकर ।
रगड़ीने देखते ही, करो माल पर मज़र ॥
हँस-हँसके नाज़-नखरे, दिखाती हैं रघिइयाँ ।
वे-दाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रघिइयाँ ॥
गई-नमें हाथ डाल, बोली वह सोमबर :-
“पहलुमें लेके सोइये, मुने कलको रातभर ॥
दोनो मने उड़ायेगे, बड़ाह ता-सहर ।”
फिर नायकाजो बोली, कि जलदी शिकार कर ॥
दाम=जाल । बाम=छत ; भ्रातरी । वेदाने=बिना चारेके । मुर्गी-दिल= यहाँ दिलको मुर्गी पकी कहा है । गेंडा=एक भयंकर मोटा जड़ली जामर । सीना=छाती । सोमबर=चन्द्रबदनी ; चाँदी जैसी गोरी । पहलु=काल ता=तक । सहर=खेवा ।