भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

पृष्ठ 459, कुल 544 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 459

( ३८४ )

नारियोंको मरनेके लिये जहर तक नहीं मिलता, पर वेश्याओं को हज़ारों-लाखोंके जेवर मिलते हैं। वेश्यामहलोंकी सती स्त्रियाँ मिहन्त-मजदूरी करके पेट भरती हैं। अनेक कुलङ्कनायें खरबे कात-कात कर और आटा पीस-पीस कर अपनी शिशु-सन्तानों को पालती हैं। इस तरह नौसमभ लोग बड़ा अन्याय करते हैं। उनके अन्याय-आचरणके फल-स्वरूप इन दुष्टा वेश्याओंकी संख्या दिनों-दिन बढ़ती है ; क्योंकि जब धर्म-मार्ग पर चलनेसे भी कुलबधुओंको अन्त-वस्त्र तक नहीं मिलते, पतिका सुख नसीब नहीं होता ; तब वे अन्तसकी अग्नि शान्त न होने और नाना प्रकारके दुःख पानेसे दुःखित हो, अपना धर्मत्याग, अधर्म-मार्गका अवलम्बन करतीं और वेश्या हो जाती हैं। इसमें उनका अपराध नहीं ; क्योंकि जैसी इन्द्रियाँ मर्दोंके होती हैं, वैसी ही इन्द्रियाँ स्त्रियोंके भी होती हैं। काम मर्दोंको सताता है, तो स्त्रियोंको भी सताता है। जिस चीज़की क्वाहिश पुरुषोंको होती है, उसीकी स्त्रियोंको भी होती है। जो पुरुष आप खाते, रण्डियोंको खिलाते, आप मौज करते, वेश्याओंको मौज कराते ; किन्तु घरकी स्त्रियोंकी सुध भी नहीं लेते, उनकी स्त्रियाँ उनका सुँह काला करतीं और—उनके जीतेजी हो, उनकी बदनामी कराती हैं। वह जैसा करते हैं, वैसा फल भोगते हैं ; अतः अपना सुख चाहनेवाले समझदारोंको आगा-पीछा सोचकर, वेश्याओंसे सदा दूर रहना चाहिये।