भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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वेश्याभक्तोंकी दुर्दशा ।

नासमभ नादान लोग जब वेश्याओंके कटाक्ष-वाणोंसे घायल होते हैं, तब रात-दिन अष्ट पहर चौंसठ घड़ी उन्हें वही वह दीखती हैं । वे उन्हें स्वर्गीय देवी समभ, उनकी हर तरह से स्तुति, पूजा और उपासना करते हैं । कोई कहता है—

दिलसे मिटना, तेरी अंगुरत हिनाईका ख्याल ।

हो गया गोशतसे, नाखुनका जुदा हो जाना ॥

कोई कहता है—

दिल वह क्या, जिसको नहीं तेरी तमन्नाये विसाल ।

चश्म वह क्या, जिसको तेरे दीदकी हसरत नहीं ॥

इस तरह उनके उपासक और भक्त उनको स्तुति किया करते हैं । उनकी ज़बानसे बात निकलती नहीं कि, उनके भक्त उसे फौन ही पूरी करते हैं । उनकी फ़रमायशें पूरी करनेके लिये, उनके सेवक अपनी ज़मीन-जायदाद गिरवी रख देते हैं, अपनी घरकी खीका जेवर तक उतार कर उनके हवाले कर देते हैं । इतनेपर भी, यदि कोई बुटि या ग़लती हो जाती है, तो वेश्यायें सख्त नाराज़ी ज़ाहिर करती हैं । उनकी नाराज़ी, वेश्याभक्तोंके लिये, ख़ुदके तीसरे नेत्र खुलने या महाप्रलय होनेके समान होती है । वे घबरा कर उनके चरणोंमें लोटते और कदमोंमें नाक रगड़-रगड़ कर माफ़ी माँधते हैं ।

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