भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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अज्ञ भी, यदि पुरुष की नज़रोंमें आ जाता है, तो उस पर बरी तरहसे ज़हर बढ़ने लगता है। ज़हर बढ़नेसे फिर पुरुषकी ख़ेर नहीं। किसीने कहा है :—

धर्म-कर्म-धन-भक्षिणी, सन्तति-खावनहार।

वेश्या है अति राक्षसी, बुधजन कहत पुकार ॥

और भी :—

दर्शनात् हस्ते चित्तं, स्पर्शनात् हस्ते बलम् ।

मैथुनात् हस्ते वीर्यं, वेश्या प्रत्यक्ष-राक्षसी ॥

वेश्या साक्षात् राक्षसी है, क्योंकि वह देखने से चित्त को, छूने से बलको और मैथुन से वीर्य को हरती है।

वेश्याओंके कारण कुल-बधुएँ भ्रष्ट होती हैं।

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वेश्याओंकी बजह से श्रेष्ठ कुलवतीऔर पतिपरायणा अबलायें नाना प्रकारके कष्ट भोगती हैं। वेश्यामक न अपने सहधर्म-णियोंके पास आते, न उनसे बोलते और न उनका आदर-सम्मान करते हैं। पतिव्रता स्त्रियोंको बानेको अन्न और तन दाँकतेको कपड़ा भी नसीब नहीं होता ; पर वेश्याओंको, जो अपने पतियोंको तज, सैसुरकुल एवं पितृकुलको बद्नाम कर, वेश्यावृत्ति करती हैं, सब तरहके सुख मिलते हैं। पतिपरायणा