भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

पृष्ठ 457, कुल 544 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 457

( ३८२ )

करते हैं। किसी विरली ही सती का सपूत इनके नेत्र-बाणों से बचे तो बच सकता है।

वेश्या सन्नी राजसी है ।

वेश्यायें पुरुष का रक्त-मांस खा जानेवाली सन्नी डायन हैं ; क्योंकि जो काम डायनोंके सुने जाते हैं, वेही काम ये करती हैं। डायनें जिसे नज़र-भरकर देख लेती हैं, वह गल-गल कर मरता है और वे उसका कलेजा निकाल कर खा जाती हैं। वेश्यायें भी जिस पर अपने कटाक्षबाण चला देती हैं, वह पगला हो जाता है और फिर वे उसका कलेजा निकाल खाती हैं। वेश्यायें लड़के और नौजवान सब को खा जाती हैं ; खासकर धनियों की तो चटनी ही कर जाती हैं। इन से न राजा की रक्षा है और न प्रजा की। इनकी भूपेट में जो आ जाता है, ये उसी का करम-कल्याण कर देती हैं। ये देखते ही पुरुषों को घायल कर देती हैं और पीछे अपनी नज़र से उनके प्राण खींच लेती हैं। सर्प का डसा हुआ आदमी बच भी सकता है, पर इन डायनोंका डसा हुआ नहीं बचता। सर्पोंके तो सुँहमें विष रहता है, पर इन के समस्त शरीरमें विष रहता है। सर्प मनुष्य के पास आकर डसता है ; पर इन का विष तो दूरसे ही, इनके देखनेमात्र से ही, चढ़ जाता है। इनके अङ्ग-प्रत्यङ्ग और एक-एक बाल तकमें जहर भरा रहता है, इसीसे इनका कोई