भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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जुगा दिखाकर नौजवान पक्षियोंको, सहजमें, अपने फन्देमें फँसा लेती है। वेश्याओंकी लपक-भपक, चटक-मटक, नाजो-अदा और हाव-भाव तथा नखरों पर उठती जवानी के नातजुरबेकार नौजवान फिदा होकर, शीघ्र ही फँस जाते और इनके गुलाम हो जाते हैं। जो इनके दास या शिष्य हो जाते हैं, वे फिर किसीके नहीं रहते। उन्हें अपनी घर-गृहस्थी, अपने पूज्यपाद माता-पिता और अर्द्धाङ्गि कहलाने वाली स्त्री तक विषवत् बुरे लगते हैं।

साधारण नवयुवकोंको पागल बनाना, तो वेश्याओंके बाँये हाथ का खेल है। जब इन्होंने पकान्त बनमें रहनेवाले, वृक्षों के पत्तों और जल पर गुजारा करनेवाले महान् तपस्वी श्रृङ्गी और मरीचि तकको अपना चेला बनाकर छोड़ा, उनको अपने रूप-जालमें फँसाकर, उनके कठिन परिश्रम से किये हुए तपको क्षणभर में नष्ट कर दिया ; तब इनके लिये नादान नौजवानों को फन्देमें फँसाना कितनी बड़ी बात है ? ऐसी शिकार मारनेमें तो इन्हें जरा भी कठिनाई नहीं होती।

ये, दिव्य मणिधारी सर्प की तरह, देखने में बड़ी मनोहर होती हैं। ये अपनी रूपच्छटा से पुरुषों के मनों को मोह लेतीं, मधुर-मधुर बातों से चित्तोंको चुरा लेतीं तथा हाव-भाव और नीजो-अदासे हिये को हर लेती हैं। योद्धाओं के अग्नि-बाणोंसे चाहे रक्षा हो जाय, पर इन के नयनबाणोंसे किसी का निस्तार नहीं। इन के-बन्धल नेत्र प्रायः सभी के हृदयों में क्षोभ