भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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जात्यन्थाय च दुर्भुलाय च जराजीर्णार्षिलांगाय च ग्रामीणाय च दुष्कुलाय च गलकुष्ठाभिन्नाय च ॥

यच्छन्तीषु मनोहरं निजवपुर्लक्ष्मीलवश्रद्धया

पयस्यन्तीषु विवेककल्पलतिकाशन्तीषु रज्येत कः ॥८६॥

कुरुप, बुढ़ापे से शिथिल, गँवार, नीच और गलित कुष्टीको, थोड़ेसे धनकी आशासे, जो अपना सुन्दर शरीर सौंप देती है और जो विवेक रूपी कल्पलता के लिये छुरीके समान हैं, उस वेश्यासे कौन विद्वान् रमण करना चाहैगा ?

वेश्या एकमात्र धनकी दामी है ।

वेश्या पैसों को प्यार करती है, पुरुषको नहीं । उसे जो पैसा देता, वह उसीकी हो जाती है ; चाहे वह भट्टी, चमार या चाण्डाल हो क्यों न हो । जातिहीन, कुलहीन, जन्मान्ध, कुरुप, बूढ़ा, दुर्बल, काना और गलित कुष्टी भी अगर धनी हो और उसे धन है, तो वेश्या—बिना किसी तरह के विचार और प्रशोपेशके—उसके नीचे अपना सोने सा शरीर बिछा देती है । वेश्या को जीवन और बूढ़े, सूबसूरत और बदसूरत, काने और अन्धे, लूढ़े और लँगड़े, निर्बल और सबल, चोर और ठग, ज्वारी और शराबी, सदाचारी और कदाचारी, हिन्दू और मुसलमान सब