शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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हे बाळे ! हे कमलनयनी ! मेरी ओर फिर अपनी दृष्टि फँक, क्योंकि सुनते हैं कि विषकी दवा विष है। मुझ पर तेरा जहर चढ़ा है, अगर तू ही उतारे तो वह उतर सकता है।
किसीने किसी इश्कके मरीजके इलाजके लिये किसी हकीमको बुलाया। हकीम साहब नज़्ज टोडलने लगे, तो किसी बुद्धिमानने कहा :—
जूँ पञ्जशाखा तू न जला उँगलियाँ तबीब ।
रख-रखके नञ्ज आशिके तफ़्ता जिगर पै हाथ ॥जौका॥
हकीम साहब ! क्यों अपने हाथको पञ्ज शाखेकी तरह दिल-जले आशिकूकी नञ्ज पर रख कर बुथा जलाते हो ? इश्क का मरीज आप की दवासे आराम न होगा।
दोहा ।
मन्त दवा अरु आपसों, वेदन मिटै न वैद ।
कामबान सों भ्रमत मन, कैसे मिटहै कैद ? ॥८८॥
सोर—साधारण अपस्मार या मृगीरोग का इलाज है, पर कामके अपस्मारका इलाज नहीं है।
88. This Kamdev ( Cupid ) like Epilepsy gives much pain due to senselessness, overcasts the mind and rolls the eyes. Neither any charm nor any medicine has any effect on those attacked by it, nor is it cured by various pacifying worships,
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