भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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नेत्र टेढ़े तिरछे घूमने लगते हैं, हाथ-पाँवोंका सत्त्व निकल जाता है और स्मरणशक्ति नष्ट हो जाती है। कामदेव रूपी अपस्मार रोगमें भी प्रायः ऐसे ही लक्षण होते हैं। कामार्त्त रोगीका मन और नेत्र घूमने लगते हैं। होश-हवास हवा हो जाते हैं। मुँहसे कहना कुछ वाहता है और निकलता कुछ है। साधारण अपस्मार और कामदेवके अपस्मारमें एक बड़ा भेद है। वह यह कि, अपस्मार तो घृत, ब्राह्मी घृत, कृष्माण्ड घृत, खलप पञ्चगव्य घृत और महापञ्चगव्य घृत तथा त्रिफला तेल एवं भूतोंके योगमें जो भाङ्ग-फूँक मन्त्र-जन्त्र किये जाते हैं, उन से आराम हो जाता है; पर कामदेव रूपी अपस्मार की कोई भी औषधि, आज तक, किसीने नहीं निकाली; इसलिये भगवान् न करे जो किसीको यह रोग हो। जिन्हें इस भयङ्कर प्राणनाशक और परमार्थ-नाशक रोगसे बचना हो, वे कामिनियों के चञ्चल नेत्रोंसे दूर रहें, क्योंकि स्त्रियों की तेज नज़रोंसे बचने वालों को यह रोग नहीं होता। यदि कोई उनकी चपेट में आ जाय, उनका विष उस पर चढ़ जाय, तो विषस्य विषमोषधम् अर्थात् विष की औषधि विष है। उनका विष वे ही उतार सकते हैं। महाकवि कालिदासने अपने “श्रृङ्गार तिलक” में कहा भी है:—

दृष्टि देहि पुनर्वाले ! कमलामृतलोचने ! श्रूयते हि पुरालोके विषस्य विषमोषधम् ॥