शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
पृष्ठ 463, कुल 544 में से
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आज तक जप में सत्य, कवे में पवित्रता, सर्पमें सहनशीलता, स्त्रियोंमें काम-शान्ति, नपुंसकों में वैश्य, शराबी में तरबचिता, राजा में मैत्री और वेश्या में सतीत्व न किसीने देखा और न सुना । वेश्यागामी कामकन्दला का नाम पेश करते हैं ; पर कामकन्दला वेश्या नहीं, गणिका थी । वेश्या और गणिका में बड़ा भारी भेद है । गणिका वेश्या से बहुत अच्छी होती है । वेश्या धन के लिए प्रेम प्रकट करके विषयी पुरुषों को तूत करती है । गणिका अनेक प्रकार की विद्याएँ जानती और प्रेम-प्रतीतिको समझती है । वेश्या नीच उपायों से कामियों को ठगती है ; पर गणिका उच्च प्रीतिरीति बांध कर धन हर्ती है । वेश्या केवल धन की साधिन होती है ; पर गणिका गुण, रूप और विद्वत्ता की भी प्राहिणी होती है । लेकिन आजकल गणिका कहाँ ? जिधर देखा, वेश्या-ही-वेश्या नज़र आती हैं । सब पूछो तो न गणिका भली और न वेश्या । दोनों से ही पुरुष के रूप, धन और यौवन की क्षति है ; अतः बुद्धिमानों को दोनों से ही बचना चाहिये । भूल कर भी, इन का नाम न लेना चाहिये ।
एक राजा और वेश्याकी कहानी ।
किसी पुराने ज़माने में एक रणधीर सिंह नामका राजा राज्य करता था । वह राजा था तो बड़ा प्रतापी और बलवान,