भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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एक गणिका नारी बुलाय लेंहूँ,

नचवावत हैं दिनकों-रनको ॥

मृदंग क्रहे—‘धिक् है ! धिक् है !!’

मजीर कहें—‘किनको किनको ?’ ॥

तध हाय उठायके नारि कहे,

‘इनको इनको इनको हनको ॥’

वेश्याकी चालें ।

‘वेश्यायें’ अपने यारोंको रिझाने और नये-नये शिकार फँसानेके लिये, मन्दिरों, मेलों-तमाशों और तीर्थ-स्थानों तथा बाग-बगोचोंमें जातीं और नाना प्रकारके मनमोहक वस्त्राभूषण पहनती हैं । कितनीही अपने यारोंकी इच्छानुसार श्रद्धांवर करतीं और कहती हैं “व्यारे ! तुम्हारे बिना हमें क्षण-भर भी कल नहीं पड़ती । माँके मारे हमारी नहीं चलती । माँके नाराज होनेके भयसे आपसे रुपया-पैसा लेना पड़ता है; वरना हमारी इच्छा नहीं कि, आपसे कुछ ले । आप हमारे सूरज और चाँद हो, आप ही हमारे पान का चूना, बिछौनेकी चादर, हुक्के की चिलम और थूकनेकी पीकदानी हो ।” नादान लोग इन की झूठी और मक्कारीकी बातोंपर लट्ठू होकर, इनको अपनी सच्ची प्रेमिका समझ लेते हैं; पर जहाँदीदा लोग जानते हैं कि, वेश्याओं में प्रीतिका नाम भी नहीं । अगर सूर्यमण्डलमें शीतलता हो, चन्द्रमा अग्नि उगलने लगे, विन्ध्या-चल समुद्र में तेरने लगे, तो वेश्या में प्रीति हो सकती है ।