शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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पर कई राजाओंने मिल कर उसे हरा दिया। पराजय होते ही, वह राजधानीसे भाग गया। उसका प्रधान मंत्री गुणसिन्धु भी उसके साथ हो लिया। दोनों घूमते-घूमते एक और नगरमें पहुँचे। उस नगरमें कामिनी नामकी एक परमा सुन्दरी वेश्या रहती थी। उस वेश्याके धन-भागडार को देख कर कुवेर भी लजाता था। अपार धन होनेकी वजहसे, वह वेश्या किसी भी अमीरका आदर न करता थी। यद्यपि वह, वेश्या होनेसे, धना-कांक्षिणी और निर्धन-अपमान-कारिणी थी; तथापि उसने ब्रह्मिणी रणधीर सिंहका बड़े आदरसे आगत-स्वागत किया। अपने धन-भागडार राजाके लिए खोल दिये और भव्य भवन टिकनेके लिये बता दिये। उसकी सेवाके लिए अनेक दास-दासी नियुक्त कर दिये। अपने झूजाने को चाबियाँ राजाके हाथोंमें दे दीं और कह दिया कि, यह धन आपही का है। अपनी इच्छानुसार खर्चा कीजिये; दिलमें जरा भी संकोच न कीजिये। राजा रणधीर राज्य रहित होने पर भी, उस वेश्या का इतना सहज प्रेम देख, मन-ही-मन अत्यन्त प्रसन्न हुआ। उसे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय, विश्वासपात्री और सती समझ कर, एक दिन एकान्तमें अपने मंत्रीसे कहने लगा—“हे प्रधान! यह वेश्या बिना किसी स्वार्थके मेरे साथ इतना प्रेम रखती है। इसने अपना सर्वस्व मुझे सौंप दिया है और व्याहता स्वीसे भी अधिक आह्लाकारिणी है। यह सब देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य होता है। समझमें नहीं अरता, इस की क्या वजह है। सभी