भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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जानते हैं कि, वेश्याएँ किसीके साथ प्रीति नहीं करतीं। इनका प्रेम एकमात्र धनके साथ होता है और खूब धन पाने पर भी ये किसी की नहीं होतीं ; परन्तु यहाँ तो सब उल्टा ही दीखता है। यह सती और अविचल प्रेमवती है, इसमें मुझे जरा भी शक नहीं होता।” गुणसिन्धु अपने मालिक की आज़ादी को रणडी की बातों की धारामें बहती देख, दिल्ली करता हुआ, कहने लगा,—“राजन् ! वेश्याका विश्वास विश्वमें कौन करता है ? कागा जती नहीं होता और वेश्या सती नहीं होती। यह ज्ञात विश्वासयोग्य नहीं। यह किसीको प्यार नहीं करती। इसका एक मात्र प्यारा रुपया है। यह अपने वचनको कभी पूरा नहीं करती। यह कभी किसीसे नेह निर्वाह नहीं करती। झूठ बोलना इसका नियम और ब्रत है। इसके मनकी बात, इसके संकल्प और इसकी महत कामनाको सहजमें ही कोई जान नहीं सकता। यह आपका अत्यन्त आदर करती है। आपके साथ अटल प्रेम प्रकट करती है ; पर यह सुख क्षणिक है। मतिहीन लोग वेश्याके बारे विचारोंको न जान कर, उसकी ऊपरी बातों पर मर-मिटते हैं। वह उपरसे अमृत है, पर भीतरसे हालाहल विष है। वेश्या—आशाकी तरह, आरंभमें अतिशय आनन्ददायिनी होती है ; परन्तु अन्तमें अमित दुःखसे पददलित कर छोड़ती है। हरि और हर प्रभृति देवता भी वेश्या और मायाके सच्चे स्वरूप को नहीं जानते ; तब आदमी बेवारा किस क्षेतकी मूली है ?