भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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राजा पर मंत्रीको उपरोक्त बातों का बड़ा असर हुआ। उनके दिलमें तरह-तरहके विचार उठने लगे। उन्होंने वेश्या की प्रीतिकी परीक्षा लेनेकी ठानी। वह एक दिन साँस चढ़ा कर मुदाँ हो गये। राजाकी अन्त्येष्टि किया करनेके लिये लोग उन्हें श्मशान पर लेगये। वेश्या भी सफेद कपड़े पहन कर, सती होनेके लिये, चिताके पास पहुँची। वह ज्योंही चितामें गिरने लगी, त्योंही राजाने चितासे उठकर उसका हाथ पकड़ लिया और कहा—“प्यारी”! सच्ची सती!.. ठहर! ठहर! मैं जिन्दा हूँ।”

उस दिनसे राजा रणधीर सिंह उस वेश्याके एकदम गलाम हो गये। उन्हें मंत्री पर बड़ा क्रोध आया। वे उसे मूर्ख समझने लगे। अब राजाके दिन फिलने और मंत्रीकी बात सच्ची होनेका समय आया। राजाने वेश्याकी अपार सम्पत्ति खर्च करके, कई लाख पैदल, पचास हजार सवार और दस हजार हाथी वगैरः अपने हाथमें कर लिये। उस सेनाको लेकर उन्होंने अपने शत्रु पर चढ़ाई की और उसे पराजित कर अपना राज्य ले लिया। वेश्या पटरानी बनाई गई। सब रानियोंसे अधिक उसका मान होने लगा।

एक रोज राजाको बहुत ही प्रसन्न देखकर वेश्याने कहा—“महाराज”! मैंने आपके साथ जो भलाई की है, उसे आप यावज्जीवन नहीं भूलेंगे। क्या आप, उसके बदलेमें, मेरी भी एक मनोकामना पूरी करेंगे?” राजाने कहा—“प्यारी! तु जो कह