भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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में वही करनेको तैयार हूँ।” वेश्याने कहा—“महाराज ! मेरा एक प्राणाधार, परम प्यारा, नयनोंका तारा है। वह निरपराध, चोर समझा जाकर, विदर्भ नगरमें पकड़ा गया और आज तक जेलमें बन्द है। आप उसे कठिन कारागारसे छुड़ाकर, दासी को कृतार्थ कीजिये।”

वेश्याकी उपरोक्त बात सुनते ही राजाके होश-हवास जाते रहे। अकृ हवा हो गई, सन्नाटा छा गया, वे उगेसे हो गये। वे इकट्ठा वेश्याके मुँह की तरफ देखने लगे। कुम्हलाये हुए कमलके फूलकी तरह, उनका सिर नीचेको झुक गया। इस समय उन्हें मंत्रोंकी बातें याद आईं। उनके दिलमें, समुद्रकी लहरोंकी तरह, एक-पर-एक संकल्प-विकल्प उठने लगे। बड़ी देरके बाद वह बोले :—

“प्यारी ! सुख-दुःखकी साधन ! तुम्हें आज क्या हो गया है ? क्या तूने आज शराब पी ली है ? तू आज ऐसी बेहूदी बातें क्यों कर रही है ?” राजाने उसे बहुत तरहसे समझाया, पर वह अपनी बातसे जरा भी न डिगी। उसने कहा—“महाराज ! आप बहुत भोले हैं। जगत्में बिना स्वार्थके कोई भी मुहब्बत नहीं करता, जिसमें हमारा तो स्वार्थपरायण व्यवहार जगत्में प्रसिद्ध है। अगर आपको मेरे उपकारका लेशमात्र भी ध्यान है और आपके चित्तपर कृतज्ञताका जरा भी संस्कार है, तो आप मेरी इस प्रार्थनाको स्वीकार कीजिये।” लाचार, राजाने सेना भेजकर विदर्भ नगरको फतह