शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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किया और उस वेश्याके यारको जेलसे छुड़ाकर उसके हवाले किया।
बुद्धिमानो ! वेश्यासे सदा सावधान रहो। वह तुमसे प्रेम रखती है, तुम्हें चाहती है, ऐसा कभी मत समझो। अगर ऐसा समझोगे, तो धोखा खाओगे। वेश्या यारसे बातें करती है; पर उसका मन और जगह रहता है। वेश्या अपना तन हर किसीको सौंप देती है, पर मन किसीको नहीं सौंपता। वह क्षण-क्षणमें नई-नई बातें कहता है। एक शब्द दूसरेके, मुक्तिकूल कहना, तो उसका कर्त्ताव्य है। बातोंका लौटफेर और फेरबका ढेर सदा उसके पास मौजूद रहता है। वेश्या स्कूटकी पुतली है। उसे यथायथ रूपसे कोई भां जान नहीं सकता। वेश्या पाँच तरहके यार रखती है—(१) एककी तो वह तारीफ़ हो किया करती है, (२) दूसरेका धन लूटता है, (३) तीसरेसे सेवा कराती है, (४) चौथेको अपनी रक्षाके लिये रखती है, और (५) पाँचवें की सदा मसखरी किया करती है। वेश्या किसीसे भी प्रीति नहीं करती। जो नर वेश्याके बन्धनमें फँस जाता है, उसको मुक्ति चिकालमें भी नहीं होती। उसका सत्यानाश हो जाता है। सुख-शान्ति उसमें किनारा कर जाते हैं। कुटुम्ब परिवार वाले उसे धिक्कारते हैं। वेश्यागानों इस लोक और परलोकमें अनेक तरह-बेकष्ट और क्लेश भोगता हुआ, चौरासी लक्ष योनियोंमें भ्रमता रहता है। जिस तरह माँप अपनी पुरानी कैंचलाको त्याग देता है; उसी तरह वेश्या अपने करोड़पति यारको भी निर्धन होते