भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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ही, जूने मारकर निकाल देती है। इसलिये जिन्हें संसारमें सुख भोगना हो, वे वैश्याके नज्दीक न जावें।

किसीने क्या खूब कहा है :—

गाना न० १

रगड़ी नहीं किसी को यार, ओ घर बार लटाने वाले। तीखे नयन चलाने वाले, रगड़ी नहीं किसी को यार ॥ इनका कूठा है जंजाल, इनका खोटा है व्यवहार। इसमें नफा नहीं है यार, ओ घरबार लटाने वाले ॥ इनके नखेरे इनकी चाल, इनके चिकने-चिकने गाल। इनके लम्बे-लम्बे बाल, आकृत करने वाले ॥ रड़ी नहीं किसीको यार, ओ घर-बार लटाने वाले। इनकी उद्दबत, इनको बातोंमें मत आना ॥ इसपर दिलको मत ललचाना, इनकी उद्दबतसे घराना।

आकृत था जाय जाने वाले। रगड़ी नहीं किसी को यार। ओ घर-बार लटाने वाले ॥ जब तक पैसा तबतक रगड़ी। जबतक बिलसे तबतक मगड़ी। वह तो खा-खा हुई मुछगड़ी। तुम पर आने लगे तमाले। जब से रुक गई घरकी मोरी। माँगो भीख करो या चोरी। अब तो हवा जेल की खा ले। रगड़ी नहीं किसी की यार। ओ घर-बार लटाने वाले ॥