शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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गाना न० २
पहले तो घरमें दाम बिछाती हैं रघिइयाँ ।
वे-दाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रघिइयाँ ॥
करके सिंगार शामको, छा बैठीं बाम पर ।
करती हैं फिर इधारा, वह मक्कार वेखतर ॥
देखा कि मालदार, कोई भ्राता है इधर ।
फौन किया सलाम, फिर उसने मुँकाके सर ॥
किस ढबसे तुम्हें चालमें, लाती हैं रघिइयाँ ।
वे-दाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रघिइयाँ ॥
लेकर सलाम हो गये, गेंडासे फूलकर ।
कोठे पै उसके चढ़ गये, सोचा न कुछ मगर ।
तकिया लगाके बैठ गये, सीना तामकर ।
रगड़ीने देखते ही, करो माल पर मज़र ॥
हँस-हँसके नाज़-नखरे, दिखाती हैं रघिइयाँ ।
वे-दाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रघिइयाँ ॥
गई-नमें हाथ डाल, बोली वह सोमबर :-
“पहलुमें लेके सोइये, मुने कलको रातभर ॥
दोनो मने उड़ायेगे, बड़ाह ता-सहर ।”
फिर नायकाजो बोली, कि जलदी शिकार कर ॥
दाम=जाल । बाम=छत ; भ्रातरी । वेदाने=बिना चारेके । मुर्गी-दिल= यहाँ दिलको मुर्गी पकी कहा है । गेंडा=एक भयंकर मोटा जड़ली जामर । सीना=छाती । सोमबर=चन्द्रबदनी ; चाँदी जैसी गोरी । पहलु=काल ता=तक । सहर=खेवा ।