शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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बाते बना-बनाके, लुभाती हैं रघिइयाँ ।
वेदाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रघिइयाँ ॥
मक्कार नायकाकी, तो छन लीजिये दास्तान ।
जल्दीसे जाके अपना, उठा लाई पानदास ॥
बोझी—“तम्बाकू छालियाँ, * गूँगा दीजियेगा पान ।”
रंड़ी बोली—“हाँ, अभी आता है मेरी जान ! ॥”
पहला सवाल तुमको, सुनाती हैं रघिइयाँ ।
वेदाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रघिइयाँ ॥
जेबोंमें लगी देखने, वह हाथ डोलकर ।
सुट्टीमें भरके लाई, कुछ थोड़ासा मालोजर ॥
उस्ताद जोसे बोली—“जरा आइयो इधर ।
कल्या तम्बाकू छालियाँ, इन्हें लादे जल्दतर ”
फौरन ही फिर तो, पान खिलाती हैं रघिइयाँ ।
वेदाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रघिइयाँ ॥
चिन्हाके बोली नायका—“यहाँ होते जाइये ।
रक्ड़ी और दूध थोड़ासा, हलवा भी लाइये ॥
दो पैसेकी अफयन भी, तुम खाते आइयो ।
सदका गई उस्ताद, जरा जल्दी आइयो ॥”
थोड़ा-ही-थोड़ा करके, मँगाती हैं रघिइयाँ ।
वेदाने मुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रघिइयाँ ॥
दास्तान—कहानी । छालियाँ—छपारी । * मालोजर—रूपया-पैसा ।
अफयन—अफोम । सदका गई=बलाये लूँ ; कुर्गान हूँ ।