शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
पृष्ठ 472, कुल 544 में से
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जब सेठजीका हो गया-भोड़सा खर्व माल।
रंडीने फिर दी उन्हें, फौरन ही एक चाल ॥
गद्दी बचाके रख लिया, एक म्यानीमें रुमाव।
बोली कि झोड़ दो मुझे, इस वक्त है गैर हास।
अव्ययभका बहाना, बनाती हैं रथिडयाँ।
वेदाने सुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रथिडयाँ ॥
फिर नायकाजी बोली—“अजी सेठजी जनाब !
बनियेका और सनारका, देना है कुछ हिसाब ॥”
रगड़ो टसकके बोली—“नहीं रेत हो जवाब ?”
घबराके बोले सेठजी—“कुलवाइये शिताब ॥”
अब घरमें उनके, आग लगाती हैं रथिडयाँ।
वे-दाने सुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रथिडयाँ ॥
बनियेका और सनारका, जब दे चुके हिसाब।
फिर सेठजी पै और हुआ, एक मया इताब ॥
“जोड़ै बनाके लाइये, जल्दीसे लाजवाब।
फिर कौन है तुम्हारे सिवा, लूटे जा शबाब ? ॥”
हर रोज ताज़ा फिकर, बनाती हैं रथिडयाँ।
वेदाने सुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रथिडयाँ ॥
जोड़ैका नाम सुनते ही, बाज़ारमें जाकर।
कपड़ा लिया और लाये वह, दरज़ीको बुलाकर ॥
म्यानी—गुप्त अंग। औरतें रजस्वला होनेके समय उस अंगमें कपड़ा रख लेती हैं, ताकि खून-हैजसे धोती झरा न हो। शिताब—जल्दी। इताब—हुकम। लाजवाब—चै जोड़, अद्वितीय। शबाब—जवानोंका मज़ा।