भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

पृष्ठ 472, कुल 544 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 472

( ३६७ )

जब सेठजीका हो गया-भोड़सा खर्व माल।

रंडीने फिर दी उन्हें, फौरन ही एक चाल ॥

गद्दी बचाके रख लिया, एक म्यानीमें रुमाव।

बोली कि झोड़ दो मुझे, इस वक्त है गैर हास।

अव्ययभका बहाना, बनाती हैं रथिडयाँ।

वेदाने सुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रथिडयाँ ॥

फिर नायकाजी बोली—“अजी सेठजी जनाब !

बनियेका और सनारका, देना है कुछ हिसाब ॥”

रगड़ो टसकके बोली—“नहीं रेत हो जवाब ?”

घबराके बोले सेठजी—“कुलवाइये शिताब ॥”

अब घरमें उनके, आग लगाती हैं रथिडयाँ।

वे-दाने सुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रथिडयाँ ॥

बनियेका और सनारका, जब दे चुके हिसाब।

फिर सेठजी पै और हुआ, एक मया इताब ॥

“जोड़ै बनाके लाइये, जल्दीसे लाजवाब।

फिर कौन है तुम्हारे सिवा, लूटे जा शबाब ? ॥”

हर रोज ताज़ा फिकर, बनाती हैं रथिडयाँ।

वेदाने सुर्गी-दिलको, फँसाती हैं रथिडयाँ ॥

जोड़ैका नाम सुनते ही, बाज़ारमें जाकर।

कपड़ा लिया और लाये वह, दरज़ीको बुलाकर ॥

म्यानी—गुप्त अंग। औरतें रजस्वला होनेके समय उस अंगमें कपड़ा रख लेती हैं, ताकि खून-हैजसे धोती झरा न हो। शिताब—जल्दी। इताब—हुकम। लाजवाब—चै जोड़, अद्वितीय। शबाब—जवानोंका मज़ा।